Friday, July 25, 2008

विदेह 15 मार्च 2008 वर्ष 1मास 3 अंक 6 9. बालानां कृते एकाङ्की अपाला आत्रेयी

9. बालानां कृते एकाङ्की
अपाला आत्रेयी
पात्र: अपाला: ऋगवैदिक ऋचाक लेखिका अत्रि: अपालाक पिता
वैद्य 1,2,3: कृशाश्व: अपालाक पति।
वेषभूषा
उत्तरीय वस्त्र (पुरुष), वल्कल, जूहीक माला(अपालाक केशमे), दण्ड।
मंच सज्जा
सहकार-कुञ्ज(आमक गाछी), वेदी, हविर्गन्ध, रथक छिद्र, युगक छिद्र, सोझाँमे साही, गोहि आ’ गिरग़िट।




दृश्य एक
(आमक गाछीक मध्य एक गोट बालिका आ’ बालक)।
बालिका: हमर नाम अपाला अछि। हम ऋषि अत्रिक पुत्री छी।अहाँ के छी ऋषि बालक।
बालक: हम शिक्षाक हेतु आयल छी। ऋषि अत्रि कतए छथि।
अपाला: ऋषि जलाशय दिशि नहयबाक हेतु गेल छथि, अबिते होयताह। (तखनहि दहिन हाथमे कमंडल आ’ वाम हाथमे वल्कल लेने महर्षि अत्रिक प्रवेश।) अत्रि: पुत्री ई कोन बालक आयल छथि। अपाला: ऋषिवर। आश्रमवासीक संख्यामे एक गोट वृद्धि होयत। ई बालक शिक्षाक हेतु... बालक: नहि। हमर अखन उपनयन नहि भेल अछि। हम अखन माणवक बनि उपाध्यायक लग शिक्षाक हेतु आयल छी। ई देखू हमर हाथक दण्ड। हम दण्ड- माणवक बनि सभ दिन अपन गामसँ आयब आ’ साँझमे चलि जायब। हम वेद मंत्रसँ अपरिचित अनृच छी। अत्रि: बेश तखन अहाँ हमर शिष्यक रूपमे प्रसिद्ध होयब। दिनक पूर्व भाग प्रहरण विद्याक ग्रहणक हेतु राखल गेल अछि। हम जे मंत्र कहब तकरा अहाँ स्मरण राखब। पुनः हम अहाँक विधिपूर्वक उपनयन करबाय संग ल’ आनब। बालक: विपश्चित गुरुक चरणमे प्रणाम। (पटाक्षेप)
दृश्य दू
(उपनयन संस्कारक अंतिम दृश्य। अपाला आ’ किछु आन ऋषि बालक बालिकाक उपनयन संस्कार कराओल जा चुकल अछि।)
अत्रि: अपाला। आब अहाँक असल शिक्षा आ’ विद्या शुरू होयत।(पुनः आन विद्यार्थी सभक दिशि घूमि।) अहाँ सभकेँ सावित्री मंत्रक नियमित पाठ करबाक चाही। ॐ भूरभुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात्। सविता- जे सभक प्रेरक छथि- केर वरेण्य- सभकेँ नीक लागय बला तेज- पृथ्वी, अंतरिक्ष आ’ स्वर्गलोक-सर्वोच्च अकाश-मे पसरल अछि। हम ओकर स्मरण करैत छी। ओ’ हमर बुद्धि आ’ मेधाकेँ प्रेरित करथु। अपाला: पितृवर।“ ॐ नमः सिद्धम” केर संग विद्यारम्भक पूर्व शिक्षाक अंतर्गत की सभ पढ़ाओल जायत। अत्रि: वर्ण, अक्षर-स्वर-, मात्रा- ह्र्स्व,दीर्घ आ’ प्लुत- बलाघात- उदात्त, अनुदात्त, स्वरित- शुद्ध उच्चारण, अक्षरक क्रमिक विन्यास- वर्त्तनी-, पढ़बाक आ’ बजबाक शैली, एकहि वर्णकेँ बजबाक कैकटा प्रकार, ई सभ शिक्षाक अंतर्गत सिखाओल जायत। साम संतान- जेकि सामान्य गान अछि- केर माध्यमसँ शिक्षा देल जायत। अपाला: गुरुवर। आश्रमक नियमसँ सेहो अवगत करा देल जाय। अत्रि: वनक प्राणी अवध्य छथि। आहारार्थ फल पूर्व-संध्यामे वन-वृक्षसँ एकत्र कएल जायत। प्रातः आ’ सायं अग्निहोत्र होयत, ताहि हेतु समिधा, कुश, घृत-आज्य-, एवम् दुग्धक व्यवस्था प्रतिदिन मिलि-जुलि कय कएल जायत। हरिणकेँ निर्विघ्न आश्रममे टहलबाक अनुमति अछि। कदम्ब, अशोक, केतकी, मधूक, वकुल आ’ सूदकारक गाछक मध्य आश्रममे यद्यपि कृषिक अनुमति नहि अछि, परञ्च अकृष्य भूमि पर स्वतः आ’ बीयाक द्वारा उत्पन्न अकृष्टपच्य अन्नक प्रयोग भ’ सकैछ। बालक: हम सभ एकहि विद्यापीठक रहबाक कारण सतीर्थ्य छी। गुरुवर। दण्ड आ’ कमण्डलक अतिरिक्त्त किचुउ रखबाक अनुमति अछि?
अत्रि: कटि मेखला आ’ मृगचर्म धारण करू आ’ अपनाकेँ एहि योग्य बनाऊ, जाहिसँ द्वादशवर्षीय यज्ञ सत्रक हेतु अहाँ तैयार भ’ सकी आ’ महायज्ञक समाप्तिक पश्चात् ब्रह्मोदय, विदथ परिषद आ’ उपनिषद ओ’ अरण्य संसदमे गंभीर विषय पर चर्चा क’ सकी। (पटाक्षेप)
दृश्य तीन
(कुटीरमे ऋषि अत्रि कैक गोट वैद्यक संग विचार-विमर्श कए रहल छथि।)
अत्रि: वैद्यगण। बालिका अपालाक शरीरमे त्वक् रोगक लक्षण आबि रहल अछि। शरीर पर श्वेत कुष्ठक लक्षण देखबामे आबि रहल अछि। वैद्य 1: कतबा महिनासँ कतेको औषधिक निर्माण कए बालिकाकेँ खोआओल, आ’ लेपनक हेतु सेहो देल।
अत्रि: अपाला आब विवाहयोग्य भ’ रहल छथि। हुनका हेतु योग्य वर सेहो ताकि रहल छी। वैद्य 2: कृशाश्वक विषयमे सुनल अछि, जे ओ’ सर्वगुणसंपन्न छथि, आ’ वृद्ध माता-पिताक सेवामे लागल छथि। ओ’ अपन अपालाक हेतु सर्वथा उपयुक्त वर होयताह। अत्रि: तखन देरी कथीक। अपने सभ उचित दिन हुनकर माता-पितासँ संपर्क करू।
दृश्य चारि
(आश्रमक सहकार-कुञ्जमे वैवाहिक विधिक अनुष्ठान अछि। वेदी बनाओल गेल अछि, आ’ ओतय ऋत्विज लोकनि जव-तील केर हवन क’ रहल छथि।) अपाला(मोने मोन): माथ पर त्रिपुंडक भव्य-रेखा, आ’ शरीर-सौष्ठवक संग विनयक मूर्त्ति, ईएह कृशाश्व हमर जीवनक संगी छथि। (तखने कृशाश्वक नजरि अपालासँ मिलैत छन्हि, आ’ अपाला नजरि नीँचा कए लैत छथि।। मुदा स्त्रीत्वक मर्यादाकेँ रखैत ललाट ऊँचे बनल रहैत छन्हि।) अत्रि: उपस्थित ऋषि-मण्डली आ’ अग्निकेँ साक्षी मानैत, हम अपाला आ’ कृशाश्वक पाणिग्रहण करबैत छी। (अग्निक प्रदक्षिणा करैत काल कृशाश्वक उत्तरीय वस्त्र कनेक नीँचा खसि पड़ल आ’ अपालाक केशक जूही-माला पृथ्वी पर खसि पड़ल।)
दृश्य पाँच

(अनुवर्तते)

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'विदेह' २३१ म अंक ०१ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३१)

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