Tuesday, July 22, 2008

विदेह वर्ष-1मास-2अंक-3 (01 फरबरी 2008) 6.संस्कृतशिक्षा(आगाँ)

6.संस्कृतशिक्षा(आगाँ)


II.
इति भवंतः सर्वे पूर्वतन् पाठेव ज्ञातवंतः।संस्कृतेन प्रथम परिचयः प्राप्तव्यः। अद्य अन्येनक्रमेण अपि परिचयस्य अन्येषाम् अपि अभ्यासं वयं कुर्मः।

अहं गजेन्द्रः। भवान् कः। अहं शिक्षकः। भवती का। अहम् अभिनेत्री। अहं छात्रा। अहं वैद्या।
अहं गृहिणी। अहं कृषकः। अहं शिक्षिकाः। अहं पाचकः। अहं तंत्रज्ञः। अहं तंत्रज्ञा।
एतद् वाक्यद्वयं योजयित्वा वयं परिचयं वदामः। एतैव सुखेन परिचयं वदामः।मम नाम गजेन्द्रः। अहं शिक्षकः। एतेन क्रमेण भवंतः वदंतु। भवान वदतु। मम नाम इंदुशेखरः।अहं तंत्रज्ञः।
मम नाम राजलक्ष्मीः। अहं अभिनेत्री। सः उदयनः। सः छात्रः। सः छात्रः वा। आम्। सः छात्रः।
तत्र कृष्णफलकम वा?
आम्। तत्र कृष्णफलकम्। न। सः वैद्यः न। एतत् फेनकम वा। आम्। तत उपनेत्रम्/कङ्कतम्। प्रशांतः सज्जनः वा।
संस्कृतं सरलं वा।
संस्कृतं मधुरं वा।
आम्। सत्यम्।

इदानीम अहं वदामि। भवंतः अपि अभिनयं कुर्वंतु।

उत्तिष्ठतु। तस्य नाम उदयनः। तस्य नाम किम्। कस्य नाम इंदुशेखरः। तस्याः नाम चन्द्रिका। तस्याः नाम किम्। कस्याः नाम चन्द्रिका।
एतस्य नाम इन्दुशेखरः। तस्य नाम किम्।
साधुः। तस्याः नाम श्रीलक्ष्मीः। कस्याः नाम श्रीलक्ष्मीः। तस्य नाम इंदुशेखरः। एतस्य नाम सुधीरः। तस्याः नाम शांतला। एतस्याः नाम राजलक्ष्मीः।
घटी। सुधीरस्य घटी।
कस्य मुखम्। सुधीरस्य उपनेत्रम्। नाशिका। कर्णः। गीतायाः घटी। गीतायाः घटी। गीतायाः स्यूतः। कस्याः करवस्त्रम। ददातु। कस्याः कुञ्चिका। सीतायाः। लतायाः। सा देवी। देव्याः नाम किम्। देव्याः नाम सरस्वती। कस्याः आभूषणम्। नर्तक्याः आभूषणम्। कस्याः कण्ठाहारः। गृहण्याः क्ण्ठाहारः। पार्वती। पार्वत्याः। पुस्तकस्य नाम श्रीमदभागवदगीता। काव्यस्य नाम अभिज्ञानशाकुंतलम्। अस्माकं देशस्य नाम भारतम्। शिक्षकस्य नाम विश्वासः। गीतायाः। प्रियायाः। राजेश्वरयाः। श्रीलक्ष्म्याः। रामः अस्ति। सर्वे रामस्य वदंति। कृष्णस्य। प्रमोदस्य। बाबूलालस्य। रमानन्दस्य। रामशरणस्य।
राधेश्यामस्य। शिक्षकस्य। लेखकस्य। छात्रस्य।
फलस्य। पुष्पस्य। मन्दिरस्य। नगरस्य। सीतायाः। राधायः। अनितायाः। मालविकायाः। कवितायाः। सुशीलायाः। गङ्गायाः। शारदायाः। भारत्याः। नद्याः। लेखन्याः। राख्याः। अङ्कन्याः। रामस्य। रामः दशरथस्य पुत्रः।
कृष्णः कस्य पुत्रः। कृष्णः वसुदेवस्य पुत्रः। रामः कस्याः पतिः। रामः सीताय़ाः पतिः। लक्ष्मणः उर्मिलायाः पतिः।
कृष्णः रुकमण्याःपतिः।
दिल्ली भारतस्य राजधानी। बेङ्गलुरु कर्णाटकस्य राजधानी। बाल्मीकिः रामायणस्य लेखकः। व्यासः महाभारतस्य लेखकः।
वयम् इदानीम् एकम् अभ्यासं कुर्मः। अहम् एकं कोष्ठकं दर्शयामि। सर्वे अभ्यासः कुर्मः।
दशरथस्य पुत्रः रामः। शिवस्य पुत्रः गणेशः। रावणस्य पुत्रः मेघनादः। अर्जुनस्य पुत्रः अभिमन्युः। रघुवंशस्य लेखकः कालिदासः। रामायणस्य लेखकः बाल्मीकिः। सीतायाः पतिः रामः। उर्मिलायाः पतिः लक्ष्मणः।
सत्यभामायाः पतिः कृष्णः।
पार्वत्याः पतिः ।
देवक्याः
मन्दोदरयाः दमयनत्याः गान्धी महाभागस्य महोदयस्य रेणु महोदयायाः मेरी महाभागायाः

सुभाषितम्

वयम् इदानीम् अद्यापि एकस्य सुभाषितस्य अभ्यासः कुर्मः। भवंतः इदानीं सुभाषितम् श्रुणवंतु।
अयं निजः परोवेत्ति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥
इदानीं यत् सुभाषितम् श्रुण्वंतः तस्य अर्थः एवम् अस्ति। लोके द्विविधाः जनाः भवति। केचन् लघु मनस्काः।ते चिंतयंति, एषः मम जनः। एषः मम जनः न। इति चिंतयंति। अन्ये केचन् संति, महात्मानामः। उदार च्रिताः। ते चिन्तयन्ति-जगत एव मम कुटुम्बः। लघु कुटुम्बः। तेषां दृष्टयासमग्रः प्रपञ्चःएव मम कुटुम्बः। सज्जनाः एवं चिंतनं कुर्वंति। धन्यवाद:।
कथा
अहं इदानीम् एकं लघुकथां वदामि।
काशीः नगरे एकः महान् पण्डितः आसीत्। सः बहुषु शास्त्रेषु पारंगतः आसीत्। तस्य समीपे बहुछात्राः अध्ययनं कुर्वंति स्म। तस्य ख्यातिः सर्वत्र प्रसारिता आसीत्। अतः दूर-दूरतः छात्राः आगच्छंति स्म।
एकदा कश्चन् शिष्यः तस्य समीपम् आगतवान्। सः गुरोः नमस्कारं कृत्वा पृष्ठवान्- भोः। अहं भवतः समीपे अध्ययनं कर्त्तुम इच्छामि। अतः माम शिष्यत्वेन स्वीकरोतु। इति सः उक्तवान्। किंतुः सर्वेषाम छात्राणां बुद्धि परीक्षां कृत्वा एव तान स्वीकरोति स्म। अतः एतस्य अपि बुद्धि परीक्षां कर्त्तुम सः एकं प्रश्नं पृष्ठवान। भोः वत्सः। देवः कुत्र अस्ति। इति पृष्ठवान। तदा शिष्यः उक्तवान। भगवन्। देवः कुत्र नास्ति। सः सर्वोव्यापी अस्ति। इति। प्रस्नरूपेण एव गुरुः पृष्ठवान। एतस्य उत्तरम् श्रुत्वागुरुः अत्यन्तं संतुष्टः जातः। सः हर्षेण तम् आलिङ्गितवान। तम उक्तवान अपि। भोः वत्सः। भवान् बुद्धिमान् बालकः अस्ति। भवंतम् अहं शिष्यत्वेन निश्चयेन स्वीकरोमि। सत्यं देवः सर्वव्यापि अस्ति। इति तम उक्तवान, शिष्यत्वेन अंगीकृतवान। एवं सः शिष्यः तत्रैव विद्याभ्यासं कृतवान,गुरोः आशीर्वादं प्राप्तवान। भवन्तः कथाम् अर्थः ज्ञातवंतः किल।

शीतं स्नानम्


उदेति सूर्यः कुक्कुटः गायति। कृषकः उत्थति पुष्पं विकसति। चटका विचरति,आकाश मध्ये,
शीतकाले जलं शीत भवति, बालः उत्थति स्नानं लब्धे,
स्नानं कृत्वा सा स्फुरति।


(अनुवर्तते)

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'विदेह' २३१ म अंक ०१ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३१)

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