Tuesday, July 22, 2008

विदेह वर्ष-1मास-2अंक-3 (01 फरबरी 2008) 5.पद्य आगाँ

5.पद्य आगाँ


59.ऑफिसमे भरि राति बन्द

साँझ परल सभ उठल,
गेल अप्पन-अप्पन घर।
बाबूजी रहथि फाइलमे ,
करैत अपनाकेँ व्यस्त।
चौकिदार नहि देलक ध्यान,
केलक बन्द ओहि राति।
हमरा सभ चिंतित भेलहुँ,
कएलहुँ चिंतित कछ्मछ धरि प्राति।
भोरमे जखन दरबान खोलि,
देखलक हुनका ऑफिसमे,
माफी माँगि औँघायल,
पहुँचेलक घर जल्दीसँ।
एक बूढ़ी हमर पड़ोसी,
कहलन्हि कोना रहल भेल,
हमरा सभतँ नहि तकितहुँ बाट,
राति भरिमे भय जयतहुँ अपस्याँत।
बेटा सभ लजकोटर, मुँहचूरू,
छन्हि हिनक हे दाइ (हमर माइ)।
हॉलीक्रॉस स्कूल दरभंगामे,
भेल छल घटित एक बात,
गर्मी तातिलमे बच्चाकेँ,
बन्द कएल दरबान।
महिना भरि खोजबीन भेल,
नहि चलल पता कथूक,
स्कूल खूजल देखल बच्चाक,
लहाश सभ हुजूम।
बाप ओकर मुँहचुरू छल,
स्कूलसँ जौँ बच्चा नहि आयल,
सुतले छोटि गएल तखन,
गेल रहय पछ्तायल।
बच्चा देबाल पर लिखने रहय,
अपन कष्टक बखान,
पानि भोजन बिना,
भेलय ओकर प्राणांत।

60. नानीक पत्र
पत्र आयल मोन ठीक नहि,
लक्ष्मी अहाँ देखि जाउ,
एहि बेर नहि बाँचब नहि,
ई गप भुझु बाउ।
पेटक अलसर अछि खयने,
चटकार सँ खाओल जेन मसल्ला।
अंतिम क्षण देखबाक बड्ड अछि मोन,
चिट्ठी लिखबाले अयलाह तेहल्ला।
क्यो नहि पहुँचेलकन्हि लक्ष्मीकेँ,
कहल चिट्ठीमे अछि भारभीस कएल,
एक आर चिट्ठी आएल जे,
माय गेलीह देह छोड़ि।
लक्ष्मीक बेटा बोकारि पारि कानय,
कहलक छी हम सभ असहाय।

नहि अयतीह हमर लक्ष्मी,
मायक मुँह देखय अंतिम बेर,
नाम रटैत अहाँक ई बूढ़ि,
गुजरि गेलि जग छोड़ि।
अपन घरक हाल की कहू,
भगवाने छथि सहाय,
घरघुस्सू सभ घरमे अछि,
दैव कृपा हे दाय।

61. केवाड़ बन्द

बाहरसँ आबयमे भेल लेट,
छोट भाय कएल केवाड़ बन्द,
किछु कालक बाद जखन खुजल,

भैय्या कहल हे अनुज,
दुःखी छी हम पाड़ि ई मोन,
अहिना जखन छलहुँ हम सभ बच्चा,
पिता कएलन्हि घर बन्द।
कनेक देरी होयबाक कारण,
पुछलन्हि नहि ओ’ तुरंत।
तुरंत काका सेहो बुझाओल,
बाल विज्ञानक द्वंद,
जे भेल से बिसरि शुरू,
करू नव जीवन स्वाच्छंद।

62. जेठांश
छोट भायकेँ देल परती,
आ’ राखल सेहो जेठांश,
मरल जखन कनियाँ तखन,
भोजक कएल वृत्तांत।
कहल नमहर भोज करू,
पाइ नहि तकर न बहन्ना।
जकरे कहबय से दय देत,
चीनी चाउर सलहाना।
खेत बेचि कय हम कएलहुँ,
श्राद्ध पिताक ओहि बेर।
अपना बेरमे नहि चलत बहन्ना,
फेर बुझू एक बेर।

63. सादा आकि रंगीन
ब्लैक एण्ड ह्वाइटक गेल जमाना,
सादा कि रंगीन।
दरिभंगा काली मंदिर लगक,
लस्सी बलाक ई मेख-मीन।
जखन बूझि नहि सकलहुँ,
तखन कहल एकगोट मीत,
सादा भेल सादा आ’
भांगक संग भेल रंगीन।

64. गंगा ब्रिज
यादि अबैत अछि मजूर सभक मृत्यु,
चक्करि खाति खसैत नीचाँ पानिमे,
पचास टा मृत्युमे सँ दस टाक भेल रिपोर्ट,
चालीस गोटेक कमपेनसेसन गेल खाय,
नेता ठीकेदार आ’ अफसर।
एहि खुनीमा ब्रिजक हम इंजीनियर,
कहैत छी हमरा ईमानदार,
घूस कोना लेल होइत छैक ककरो,
देखैत गुनैत ई सभ यौ सरकार।

65. दरिद्र
आठ सय बीघा खेत,
कतेक पोखरि चास-बास।
मुदा कालक गति बेचि बिकनि,
झंझारपुरसँ धोती कीनि,
घुरैत काल देखल माँच।
धोती घुरा कय आनल,
आ’ कीनल माँछ,पूछल,
हौ माछ ई काल्हि कतय भेटत,
धोतीतँ जखने पाइ होयत,
जायब कीनि लायब तुरत।
दरिद्रताक कारण हम आब बूझि गेल छी,
एक दिनुका गप नहि ,
सभ दिनुका चरित्र छी।

66.रौह नहि नैन

हँ यौ नैन अछि ई,
मुदा शहरक लोक की बुझय,
सभ ताकैत अछि रौह,
नैन कहबय तँ क्यो नहि कीनय।
छागर खस्सी आ’ बकरीक,
अंतर जौँ जायब फरिछाबय,
बिकायत किछु नहि बिनु टाका,
एहि नगरमे किछु नहि आबय।

67. जूताक आविष्कार
जखन गड़ल एक काँट,
राजा कहलक ओछाउ,
बना माटिक हमर ई,
राजधानी निष्कंटक बनाऊ।

जखन सभटा चर्म आनि कय,
नहि कए सकल ओछाओन,
एक चर्मकार आओल आ’,
राजाकेँ फरिछाय बुझाओल।
पैर बान्हि ली चर्मसँ आकि,
पृथ्वीकेँ झाँपी ओहिसँ,
निष्कंटक धरती नहियोतँ,
मार्ग निष्कंटक होयत।

68. जोंकही पोखरिमे भरि राति
सुनैत छलहुँ जे बड़बड़ियाबाबू साहेबक,
लगान देलामे जौँ होइत छल लेट।
भरि राति ठाढ़ कएल जोंकही पोखरिमे,
बीतल युग अयलाह फेर जखन हाथी पर,
लेबाक हेतु लगान-लहना जहिना,
गारि-गूरि दैत हाथी पर,छूटल,
टोलक-टोल, मुँह दुसना,
जमीनदारी खतम भेलो पर सोचल,
किछु ली असूलि,
मुदा लोक सभ बुधियारी कएल,
नहि अएलाह ओ’ घूरि।

69. गैस सिलिण्डरक चोरि
गेलहुँ रपट लिखाबय,
भेल छल सिलिण्डरक चोरि।
मोंछ बला थानेदार बजलाह,
बूरि बुझैत छी हमरा सभकेँ,
डबल सिलिनडर चाही,
एफ. आइ. आर. सस्ता नहि,
अछि एतेक हे भाइ।
हम कहल डबल सिलेण्डर,
तँ अछिये हमरा,
अच्छा तँ
तेसर सिलेण्डर लेबाक अछि देरी।
तकल कतय चोरकेँ अहाँ,
अहाँक तकनाइ अछि जेना,
चैत अछि कोल्हूक बरद।
भरि दिन घुमैछ नहि बढ़ैछ,
एको डेग,अहँ नहि करू सैह,
प्रगतिक नाम पर एहि बेर।
स्कूटरक चोरिक बेर कहलक,
इंस्योरेंसक पाइ चाही,
कहू अहाँसँ कोर्टमे भ’ पायत,
देल अहाँसँ गबाही।
फेरी पड़ि जायत अहाँकेँ,
पुनः कोर्टमे जायब,
उलटा निर्णयो भ’ जायत,
बूझि फेर से आयब।
संग गेल ड्राइवर कहलक नोकरी,
छैक एकरे ठीक,
पाइयो अछि कमाइत करि,
रंगदारी,फेकैत पानक पीक।

70. फैक्स
फैक्टरी पहुँचि कहल,
करू सर्च वारंट पर साइन,
मालिक कहल रुकू किछु काल धरि,
फोन करय छी आइ।
ट्रांसफरक ऑर्डर आयल,
रिलीविङगक संगहि,
अफसर निकलल ओतयसँ,
वारंट बिना एक्सीक्यूट केनहि।

71.बूढ़ वर
कतय छी आयल आइ,
ताकि रहल छी वर,
20-20 वरखक दूटा,
अछि कतहु अभड़ल।
रंग सिलेबी सिंघ मुठिया,
अद्ंत तकैत छी अहाँ,
से भेटत कहिया।
की चाही एकटा पैघ,
20-2- केर दू गोटक बदला,
40 केर जौँ एकटा,
लय ली तँ छी हम तैयारे,
काज खतम करू सभटा।

72.नौकर
फोन करि कय घरमे पूछल,
छथि फलना घरमे आकि,
आगू पुछितथि ओ’ ब्अजलाह,
दय कय एक धुतकारी।
एहि फोनक हम बिल भरैत छी,
नहि करू अहाँ पुनः बात,
मैसेज अहाँक देब हम पुत्रकेँ,
से छी के अहाँ लाट?
नौकर नहि अहाँक ने छी,
से हम अपन पुत्रक,
कनिया कहि टा छी हम नौकर,
बुझू ई यौ अफसर।


73.क्लासमे अबाज
दुनू दिशक बेंचकेँ उठाकय पुछलन्हि,
आयल कोन कातसँ अबाज।
पकड़ल एक कातकेँ छोड़ल,
फेर कएल दू फारि।
आधक-आध करैत पहुँचलाह,
फेर जखन लग लक्ष्य,
दुइ गोट मध्य जानि नहि सकलाह,
अबाज केलक कोन वत्स।
रैगिंगमे सेहो अहिना कए,
सभकेँ कहल उठि जाऊ,
जखन क्यो नहि उठल कहल,
अहाँ अहाँ अहाँ एकाएकी उठैत जाउ।

(अनुवर्तते)

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...