Tuesday, July 22, 2008

विदेह वर्ष-1मास-2अंक-3 (01 फरबरी 2008) 3.महाकाव्य 1.महाभारत(आगाँ)

3.महाकाव्य 1.महाभारत(आगाँ)

समय बीतल प्रदर्शन-शस्त्रक छल आयल।

भीष्म पूछल द्रोणसँ की-की सिखाओल,
युद्ध-कौशल,व्यूह रचना आ’ शस्त्रकौशल।
प्रदर्शनक व्यवस्था भेल जनक बीचहि,
एकाएकी सभ भेलाह परीक्षित संगहि।
भेल भीम-दुर्योधनक गदा-युद्धक प्रदर्शन।
भीष्म-धृतराष्ट्रक हृदय-बिच वातसल्यक,
जखन छल द्वंदकबीच अर्जुक बेर आयल।
एकानेक बाण-विद्यासँ रंगस्थली गुंजित,
घोष अर्जुनक भेल बीचहि कर्ण आयल।
परशुराम शिष्य कर्ण कएलक विनय,
कए छी सकैत हम प्रदर्शन सभक जे,
विद्या जनैत छथि अर्जुन सकल सभ,
पाबि सह दुर्योधनक ललकारा देलक,
अर्जुन द्वंद हमरासँ लड़ू से प्रथमतः।

कृपाचार्य कहल सारथीपुत्र छी अहाँ,
राजकुमारसँ द्वंदक अधिकारी कहाँ।
द्वंदता नहि अहाँसँ फेर बात द्वंदक,
द्वंद-युद्धक गप आयल ओना-कोना।
ई सुनि दुर्योधन केलक ई घोषणा,
बात ई अछि तँ सभ सुनैत जाऊ,
अंग-देशक नृप कर्णकेँ बनबैत छी,
योद्धाक परीक्षण करैत अछि बाहु,
अंग देशक नृप कर्णकेँ बनबैत छी।
कहि ई अभिषेक कएल सभागारेमे,
अंकमे लेल कर्ण भेल कृतज्ञ ओकर।
उठि अर्जुन तखन ई बात बाजल,
हे कर्ण अहाँ जे क्यो छी, सुनू ई,
हम द्रोण शिष्य अर्जुन ई कहय छी,
बुझू नहि जे ई वीरताक वरदानटा,
नहि भेटल अछि से अहीँक सभटा।
गुरु नहि सिखओलन्हि हारि मानब,
प्रतिद्वंदीसँ द्वंद करब जखन चाहब।

करतल ध्वनिसँ सभागार भेल फेर गुंजित,
भीष्म उठि कएल संध्याक आगमन सूचित।

अर्जुनक गर्वोक्ति सुनि कर्णक हृदय छल,
मोन मसोसि नृप अंगक गामपर पहुँचल।
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शिष्टताक हेतु पाण्डव भेलाह प्रशंशित।
भेल एहिसँ दुर्योधनक मोन शंकित।
शकुनि दुःशासन छल ओकर भक्त,
कर्णसँ भेँट उत्तर ओ’ भेल आश्वस्त,
धृतराष्ट्रकेँ सभक कनफुसकीसँ त्रस्त।
पिता छलहुँ अहाँ सिंहासनक अधिकारी,
जन्म-अंधताक रोकल राजसँ अहाँकेँ ,
हमरा तँ नहि अछि एहन लाचारी।
युधिष्ठिरकेँ सभ मानय लागल,
सिंहासनक अधिकारी किएक,
अहँक सेहंता की भए पाएल,
फलाभूत कोना अहुना ईएह।
युधिष्ठिर ज्येष्ठ हमरासँ अछि,
परंतु अछि अनुज पुत्र सएह।
कएल आग्रह जएबाक मेला,
वारणावतक पाण्डवसँक करू।
ता’ सुधारब व्यवस्था सभ,
कल्याणकारी कार्य सभसँ,
बिसरि जायत पुत्र कुंतीक,
जन सकल हस्तिनापुरक।

धृतराष्ट्र मानल सभटा बात,
आदेश देल वारणावत जाथु,
कुंति देखि मेला-ठेला आउ।
विदुर भेल साकंक्ष भेद ई की,
सचर रहब युधिष्ठिर कहल ई।
विदुरक नीति कएल साकंक्ष,
दुर्योधनक काटल सदि प्रपंच।
मंत्री पुरोचनसँ मिलि दुर्योधन,
लाखक महल बनबओने छल,
विदुर लगेलन्हि एकर पता,
संवाद सेहो पठओने छल।
वाहक संदेशक छल कारीगर,
निर्माण सुरँगक कएने छल।
लाखक महलक भीतर छल,
निर्माण से क्षणहिमे कएल।
पाण्डवकेँ निर्देश भेल छल,
खोह सुरँगहिमे सूतइ जाउ,
आगिक पूर्ण शंका से छल,
लगिते भीतरसँ बाहर आउ।
कृष्ण चतुर्दशीक छल ओ’
दिन, पुरोचन भेल से अतिशय चंचल,
आगि लगायत आइ ओ’ सँ छल,
युधिष्ठिर छल ई सभ बूझि रहल।
कए सचेत अपन माता-भ्राताकेँ,
यज्ञ कएलन्हि ओहि दिन से,
भात-भोज देलन्हि नगरवासीकेँ,
पंचपुत्र छलि भीलनी सेहो एक।
कालक सोझाँ ककर चलल जे,
सूतलि राति ओतहि सभ तेँ।
पुरोचन सेहो सुतल ओतहि,
बाहर दिश छल कोठली एक,
आगि लगाओल भीम तखन,
बीच रातिमे मौका केँ देखि।
लाक्षागृह छल बन से ओतय,
अग्नि देवता अहि केर लेल।
घरक सुड्डाह होइमे लागल,
कोनो क्षण नहि से जतय।
नहि बिलमि माता- भ्राता,
प्रणाम अग्निदेवकेँ कए।
निकलि कुंति कालक गालसँ ,
बचलि दुर्योधनक कुचालिसँ।

पुरोचन अग्नि मध्य से उचिते भेल,
संग परंतु भीलनीक नीक नहि भेल।
जरलि बेचारी पुत्र सहित से सूतल,
ककरो बुझना छल नहि गेल छल।

नगरवासी बुझलन्हि जे जरलि,
कुंती पाँचो पुत्र सभहिक संगे।
नगर शोकसँ भेल शोकाकुल,
खबरि हस्तिनापुर जौँ गेलेँ।
दुर्योधन छल अति प्रसन्ना आ’,
धृतराष्ट्र प्रसन्न छल मोने-मोने।
परंतु विदुर सभसँ बेशी प्रसन्न,
किएकतँ सत्य बूझि छल गेले।

से ओ’ कहल भीष्मकेँ सभटा,
बात रहस्यक जा’कय ओतय,
भीष्मक चिंता दूर कएलन्हि ,
ई सभ गप जाय बुझा कय।
अकाबोन पहुँचैत गेलाह गय,
पाण्डव-जन कष्ट उठा कय।
नाविक नावक संग प्रतिक्षा,
करि छल रहय विकल भय।
कहलन्हि विदुर पठेलन्हि हमरा,
आज्ञा दी गंगतट सेवा करबाक।

गंगा पार भेलथि पाण्डव जन,
पाछू छूटल कतेक भभटपन।
धृत्राष्ट्रक,दुर्योधन आ’ शकुनीक,
आ’ दुःशासन कर्ण सभहीक।
संग मुदा लागल प्रतिशोध,
हस्तिनापुरल छल ई दुर्योग।
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नहि जानि जायत कतय पथ ई,
पथ न जतय छल ओहि वनमे,
डेग दक्षिण दिशा दिश दी,
गंतव्यक छल नहि ज्ञान कोनो।
दैत डेग बढ़ैत आगू,
भूखल-पियासल थाकल ठेहिआयल,
आह दुरदशा देखू ई।
कुंतीक ई दशा देखि,
भीमसँ नहि छल गेल रहल ,
वट-वृक्षक नीचाँ बैसा कय,
चढल देखल सजग भ’।
पक्षी किछु दूर छल ओतय,
भीम जाय पहुँचल जलाशय,
पानि पीब आनि पियाओल,
सुतल सभ कुम्हलाय ओतय।

भीमकेँ नहि गेल देखल,
करथि की हूसि मोन होअय,
पोखरिक गाछक ऊपर छल राक्षस
नाम हिडिंब जेकर।
हिडिंबा बहिनक संग छल,
ताकि रहल अपन भोजन।
मनुक्ख-गंध सूंघि कय,
चलल नर-मांस ताकिमे ओ’,
हिडिंबे जो मौस-मनुक्खक,
आन जल्दी ओतय जाकय।
देखि कुंती-पुत्र संग सूतल,
दुःखित हिडिंबा छल ताकैत,
भीमक हृष्ट-पुष्ट शरीर देखि,
ठाढ नेत्रे रहलि ताकय।
धरि धारण रूप सुन्दरीक,
कहल भीम जाऊ उठाऊ,
अपन माता बन्धुकेँ,
दूर सुरक्षित हिनका पहुँचायब।
मोहित छी हम अहाँ पर,
चाह हमरा अछि विवाहक,
मायासँ हम बचायब,
बलवान क्रूर हिडिम्बक मारिक।
भीम कहल हम किये उठायब,
बंधु केँ सुतल अपन,
बलवान अछि हिडिंब एहन,
बल देखय हमरो तखन।
हिडिम्ब पहुँचल ओतय,
हिडिम्बा छलि सुन्दरीक रूप बनओने,
भीमसँ करि रहलि छलि गप,
क्रोधसँ क्रोधित हिडिम्बकेँ कएने।
ओ’ दौड़ल हिडिम्बा पर मारक हेतु,
भीम पकड़ल बिच्चहिमे,
मल्लयुद्ध पसरल ओतय से,
विकट द्वंदक हुँकार छल गूँजैत।

वन्यप्राणी भागय लागल आ’
उठलि कुंती-पांडव ओतय,
पहुँचैत गेल दौड़ैत ओतय,
रणभूमि साजल छल जतय।
मारि देलक भीम तावत,
भेल हिडिम्ब शवरूप यावत।

भीमक वीरतासँ हिडिम्बा भेलि छलि
ओ’ आनंदित,
वाकचातुर्यसँ कएने छलि
कुंतिकेँ प्रसन्न किंचित्।
युधिष्ठिर सेहो देल स्वीकृति
माता कुंतीक विचार जानि,
विवाह करि कय रहय लागल,
भीम हिडिम्बाकेँ आनि।
घटोत्कच उत्पन्न भेल,
पिता तुल्य पराक्रम जकर छल।
दिन बीतल पाण्डव वन छोड़ि
कय आगाँ जाय लागल ,
जायब हिमालय दिशि पुत्रक
संग ई हिडिम्बा बाजलि।
घटोत्कच कहल पितु माताक
हम सदिकाल संगे रहब,
होयत कोनो कार्य अहाँक,
बजाबयमे नहि संकोच करब।

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जाति काल ब्यास भेटलाह कुंती
कानलि हाक्रोस कय,
ब्यास कहल नहि कानू दिन
छोट पैघ होयबे करय। दुःख
कि सुखमे अपना पर नहि छोड़य
अछि नियंत्रण, धर्मपथ पर जे चलय ,
तकरे कहय छी मनुष्य तखन।
गर्वित सुखे नहि होय,
दुःख्मे धैर्यक न अवलंब छोड़य,
कुंती आ’ अहँक पुत्र छथि,
तेहन जेहन ई मनुष्य होमय।
पाण्डवजन पाबि ई संबल,
पहिरल मृगचर्म वल्कल,
ब्रह्मचारी केर भेष बनाओल,
एकचक्री नगर पहुँचल।
रहल बनि अतिथि ओतय,
आतिथ्य ब्राह्मणक पाओल,
भाइ सभ जाथि आनथि सभ
राखथि माताक समक्ष।
कंती देथि आध-भीमकेँ
आधमे शेष सभ मिलि खाथि,
भीमक तैयो भूख मिटैन्ह नहि
भुखले ओ’ रहि जाथि।
भुखले छलाह भीम एक दिन
गेलाह नहि भिक्षाटनमे,
सुनल घोर कन्नारोहट
घरमे पूछल कारण जानल से।
बकासुर राक्षस ओतय छल
नगर बाहर निवास जकर,
राजा असमर्थ छल
राक्षस करए अत्याचार बड़-बड़।
छल निकालल समाधानजे सभ
परिवारसँ प्रतिदिन एक,
कटही गाडी भरि अन्न मदिरा
मौस जाथि बहलमान।
बक खाइत छल सभटा
संग बहलमानहुकेँ से,
कन्नारोहट मचल छल
घर ब्राह्मण परिवारक मध्ये।
पार छल परिवारक आइ
सभ परिवार दुःखित छल,
कुंती कहल पाँच पुत्र अछि,
भीमक बल सुनायल।
भीमक बलक चर्च सुनि-सुनि
कय ब्राह्मण मानल,
कृतज्ञ भेल भीमकेँ ओ’
गाड़ीक संग खोह पठाओल।
खोह राक्षसक ताकि भीम
खेलक छल ओ’भुखाएल,
तृप्त स्वयं भीम छल देरी सँ
अतृप्त बकासुर आयल।
तामसे आक्रमण कएलक
किंतु लात-मुक्का मारि कय,
भीम प्राण लेलक ओकरा
खींचि नगर द्वार आनि कय।
भेल प्रसन्न सभ जन मनओलक
पूजा- पर्व ओतय,
कुंती चललीह आर किछु दिन
ओहि नगर रहि कय।
सुनल पांचालक स्वयंबरक,
कथा पांचालीक द्रुपदक,
एकचक्रा नगरीसँ ढेरक-ढेर
ब्राह्मण पहुँचैत ओतय।
पाण्डवजन लय रहल
आज्ञा मातृ कुंतीसँ रहथि,
ब्यास पहुँचि कहल जाउ
स्वयंबर ओतय देखय।
मार्गमे ऋषि धौम्य भेटलाह
छलाह पंडित ज्ञानी,
बढ़ल आगू तखन मिलि
संकल्पित भ’ सभप्राणी।
सुनि कथा प्रशंसा यज्ञसँ
निकललि याज्ञसेनीक,
मत्स्यभेद करताह जे
क्यो द्रौपदी वरण करतीह।
स्वयंबरक स्थानक रस्ता
तकलन्हि पांचालमे जा कय,
कुम्भकारक घर डेरा देलन्हि
विचार कुंतीक मानि कय।
कर्ण आयल छल दुःशासन,
दुर्योधनक संग सज्जित,
देश-देशक राजा आयल छल
रंगभूमि वीरसँ खचित।
तखन आयल द्रौपदी भाइ
धृष्टद्युम्नक संग सुसज्जित,
पुष्पमाल लेने आयलि केलनि
सभक नजरि आकृष्ट।
बीच स्वयंबरक भूमिक ऊपर
मत्स्य एकटा लटकल,
ओकर नीचाँ चक्र एकटा तीव्र
गतिये छल घूमि रहल।
नीचाँ पानिक छह देखि जे
चक्रमध्य पातर भुरकी तर,
दागि सकत मत्स्य आँखिकेँ
पुष्पमाल पड़त तकरे गर।
सभटा राजा हारि थाकि कय
भेल विखिन्न थाकल छल,
कर्ण देखि जन बाजि उठल सूत
पुत्र किए आयल छल।
द्रौपदी बाजलि भेदियो देत
जौँ कर्ण मत्स्य-लोचनकेँ,
नहि पहिरायब वरमाला नहि
करब वरण ओकराकेँ।
विवश कर्णकेँ बैसल देखि
ऋषिवेश अर्जुन आयल छल,
एकहि शर-संधानसँ बेधल मत्स्य
सुयश पाओल छल।
ब्राह्मण-मंडली कएने छल
भीषण जय-जयकार ओतय,
राजा सभ कएलक शंका
तैयार अर्जुन पुनि संधान कए।
बिद्ध मत्स्य भू खसल भूमि
बलराम कृष्न आगाँ आओल,
सभ राजाकेँ बुझाय सुझाय छल
सहटाय ओतय हटाओल।
कृष्ण एकांती कहल दाऊ सुनू ई,
सुनल छल एक उरन्ती,
वारणावत आगि बिच बचल पांडव,
बचल छलि कुंती दीदी।
भीम तखने उखाड़ि वृक्ष छल
भेल ठाढ़ सहटि अर्जुन कय,
कृष्ण कहल हे दाऊ कालचक्र
अनलक एतय भीम अर्जुनकेँ।
देखि पराक्रम हतोत्साहित भेल
राजा सभ प्रयाणकएने छल,
पांडव लय चललाह द्रौपदीकेँ
व्यग्र एहिसभसँ ओ’ भेलि छलि।
अर्जुन खोलि अपन रहस्य
खिस्सासँ द्रौपदीकेँ कएल विह्वल,
धृष्टद्युम्न चुपचाप सुनय छल
घुरि पिताकेँ ई कथा कहलक।
कुम्भकारक घर पहुँचि पांडव
कहल देखू की हमसभ आनल,
कुंती कहल आनल अछि जे
सभ तकरा बाँटू पाँचू पाण्डव।
कहल अर्जुन हे माता होयत
नहि व्यर्थ अहाँक ई बात,
संग द्रौपदीक होयत विवाह
पाँचू-पाण्डवक संग- साथ।
द्रुपद पठेलन्हि पुरहितकेँ
धृष्टद्युम्नक संग ओतय,
कुंतीकेँ नोतल आ’
सभकेँ लए गेल अपना संग।
द्रुपद सुनल जे पाँचू-पाण्डव
करताह विवाह द्रौपदीसँ,
तखनहि ब्यास आबि
सुनाओल ई अछि पूर्वजन्महिक।
भेटल चालन्हि वरदान शिवसँ
जे पाँच पति अहाँ पायब,
सुनि सभ द्रौपदी विवाह
द्रुपद रीति वैदिक सँ कराओल।
सभ किछु दिन रहल ओतय
कुशलसँ द्रुपद केर महलमे,
पसरल ई चर्चा सगरो धरि
गेल गप हस्तिनापुर महलमे।
लोकलाजसँ बाह्य प्रसन्नता
धृतराष्ट्र छल ओतय देखओने,
मानि भीष्म-द्रोणक विचार
पठाओल समाद अगुतओने।
आनी अनुज पत्नी पुतोहु ओ’
अनुज पुत्र सभकेँ आदरसँ,
दुर्योधनक कर्णक विरोध पर
कल विचार विदुरकेँ बजाकय,
शास्त्रानुसार विचार देलन्हि
आधा राज्य देबाक ओ’ जाकय।
विदुरहिकेँ पठाओल धृतराष्ट्र
आनय राजमहलम द्रुपदक,
सभकेँ लय आनल पहुँचल ओ’
जन ठाढ़ करए स्वागत।
धृतराष्ट्र कहल हे युधिष्ठिर
गृह कलहसँ ई नीक होयत,
जाय खाण्डवप्रस्थ बसाउ
नव नगर आध राज ल’ कय।
खाण्डवप्रस्थ अछि बोन एखन
पहिने छल राजाक नगरी,
मानि युधिष्ठिर गेल ओतय
बनाय नव घर द्वार सज्जित।
इन्द्रप्रस्थ छल पड़ल नाम,
आ’ तेरह वर्ष धरि केलन्हि राज,
यश छल सुशासनसँ आ’ छल
जन-जीवन अति संपन्न।
(अनुवर्तते)

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...