Tuesday, July 22, 2008

विदेह वर्ष-1मास-2अंक-3 (01 फरबरी 2008) 2. उपन्यास1.सहस्रबाढ़नि(आगाँ)

2. उपन्यास
1.सहस्रबाढ़नि(आगाँ)

मजदूरक टोल आ’ साँझमे ठेलागाड़ी पर हुनका लोकनि द्वारा अपन कपड़ा सुखायब, एहि सभकेँ देखि कय हमारा विचलित भय जाइत छलहुँ। ई देखलाक बादो जे हुनका लोकनिक मुँह पर हँसी छन्हि, बिना घरक रलो उत्तर। छोट-छोट बच्चा सभक भीख मँगैत देखब, हमारा सभ जखन खेलाइत रहीतँ ओकरा सभक हमरा सभक दिशि कातर दृष्टियँ देखीअब। लोक सभक दुत्कार, कयो हमरो पर ई विपत्ति आबि जय तखन? फेर दोसर क्यो हुनका लोकनिक दिशि तकबो नहीं करन्हि, तँ की हमही टा आन बच्चासँ भिन्न ची आ’ सोचनी लागल रहैत अछि। हमारा ई सोचैत रही जे जखन हमारा कोनो स्थान पर नहीं रहैत छी तखनो तँ सभ कार्य गतिसँ चलैत अछि। किताबमे हमारा पढ़्ने रही जे किछु जीव जंतु मात्र दू डाइमेंसनमे देखैत छथि। हमरा सभ तीन डाइमेंसनमे जिबैत छे, तँ ई जे भूकंपक आ’ आन आन विपत्ति अबैत अछि से कोनो चारि डाइमेंसनमे कार्य करय बलातँ नहीं कय रहल अछि जे कल्पनातीत अछि। पाँच पाइमे लालछड़ी बलाकेँ देखा कय बाबूजी कहैत रहथि जे देखू ईहो लोकनि अपन परिएआरक गुजर पाँच-पाँच पाइक ई लालछड़ी बेचि कय कए रहल छथि।पाइक महत्त्व आ’ ओकर आवश्यकता जतेक बढ़ाऊ ततेक बढ़त।
अपन, अपन वातावरणक आ’ जीवनक बादक जीवनक,एहि सभक संग जीनाइ , रातिमे बड़बड़ेनाइ ई सभ गोट कार्यक संग पढ़ाइ आ’ पिताक नौकरीक परेशानी सभ चलैत रहल। हमरा यादि अबैत अछि जे एक दिन भोरे-भोर एक गोट ठीकेदारक सूटकेश पर हमर बाबूजी जोरसँ लात मारने छलाह। सूटकेश जाय दूर खसल आ’ ओहिमे राखल रुपैय्या सौँसे छिड़िया गेल। हमर एक गोट पितियौत भाइ छलाह, जे सभटा पाइकेँ उठा सूटकेशमे राखि वापस ठीकेदारकेँ दय वापस कए देलखिन्ह आ’ ईहो कहलखिन्ह जे जल्दीसँ भागि जाऊ नहितँ पुलिसकेँ पकड़बा देताह। माँ हमरा भीतरका कोठली लय गेलीह। हमारा बच्चा छलहुँ मुदा हमरा बुझबामे आबि गेल छल जे ई पाइ हमरा बाबूजीकेँ गंगा-ब्रिजक ठीकेदारक दिशिसँ अपन एंजीनियरिंग छोड़ि कय बिना कोनो भाङ्ठक कार्य होमय देबा लय देल जयबाक प्रयास छल। बाबूजी बहुत काल धरि बड़बड़ाइत रहलाह। कख्नो काल दालिमे नून कम रहला उत्तर आकि आन कोनो कारणसँ बर्त्तनकेँ फेंकबाक स्वरसँ देह सिहरि जाइत छल।फेर किछु क्षणक चुप्पीक बाद सभ बच्चाकेँ बजाओल जाइत छल आ’ दुलार मलार होइत छल। हम वर्गमे प्रथम अबैत छलहुँ आ’ परिणाम निकलबाक दिन एकटा चाची सभ बेर लट्ठा खोआबैत छलथि। गुर आ’ प्रायः आटसँ बनल एहि लट्ठाक स्वाद ह बिसरि नहि सकल छी। ओहि चाचीक एकटा अर्द्ध-पागल दियर छलन्हि जे सितार बजबैत रहैत छल। एक बेर गंगामे स्टीमरसँ हमरा सभ ओहि पार जाय रहल छलहुँ तँ ओ’ ओहि स्टीमर परसँ अपन भायकेँ फेंकबा लेल उद्यत भय गेल छल। ओहि चाचीकेँ एकटा बेटी रहन्हि रजनी। पता नहि कोन बिमारी भेलैक, बेचारी एलोपैथिक दवाइक फेरमे ओछाओन धय लेलक। हम सभ कताक बेर हुनका देखबा लेल जाइत रही। हमरा दोसराक अहिठाम जायमे धख होइत रहय मुदा ओतय ककरो संगे पहुँचि जाइत रही। हुनका सभ क्यो दीदी कहैत रहियन्हि। हमर सभसँ बड्ड पैघ रहथि। मुदा किछु दिनक बाद हुनकर मृत्यु भय गेलन्हि। मृत्युसँ हमर मानसिक द्वंद आब लग आबि गेल। हुनकर मृत्युक बादो ओ’ चाची अपन बेटा सभकेँ अगिला दिन स्कूलक हेतु तैयार कए पठेलन्हि जे कॉलोनीक एकगोट दोसर दबंग चाचीकेँ पसिना नहि पड़लन्हि, आ’ एकर चर्चा बहुत दिन धरि कॉलोनीमे होइत रहल। चाचीक भाइ मुजफ्फरपुर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलोजीमे व्याख्याता रहथि, एहि कॉलेजसँ हमर बाबूजी सेहो इंजीनियरिंग पास कएने रहथि। ओ’ हाजीपुरमे गंगा-ब्रिज कॉलोनी स्थित हमर सभक घर पर आयल रहथि आ’ अपन बहनोइकेँ बड्ड फझ्झति कएने रहथि।पटना जा’ कय नीक इलाज करेबामे अस्फल रहबाक कारण पाइकेँ बतेने रहथिन्ह। हमरा मोनमे ई विचार आयल रहय जे पट्नामे पैघ डॉक्टर रहैत अछि जे मृत्युकेँ जीति सकैत अछि। मुदा एक दिन हमरा सभक संग रहयबला गामक पितियौत भाय जखन परमाणु युद्धक चर्चा कए रहल छलाह आ’ ईहो जे ओहि समय पृथ्वी पर एतेक परमाणु शस्त्र विद्यमान रहय जाहिसँ पृथ्वीकेँ कताकबेर नष्ट कएल जा सकैत अछि, तखन हमर ईहो रक्षा कवच टूटि गेल छल।

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'विदेह' २३१ म अंक ०१ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३१)

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