Sunday, July 27, 2008

विदेह 01 मई 2008 वर्ष 1 मास 5 अंक 9 7. संस्कृत शिक्षा-गजेन्द्र ठाकुर

7. संस्कृत शिक्षा
(आँगा)
-गजेन्द्र ठाकुर
कथा
कश्चन् आश्रमः तत धौम्यः इति महर्षिः पाठेति स्म। बहुशिष्याः तस्य समीपे पाठनार्थम् आगच्छति स्म। एकदा महती वृष्टिः आसीत्। क्षेत्रं सर्वम् अपि जलपूर्णम् आसीत्। जलप्रवाहः आसीत्। धौम्यः शिष्यं व्दति- शिष्या कृषिक्षेत्रं सर्वं जलपूर्णम् अस्ति। सर्वत्र प्रवाहः अस्ति। अतः कुत्रापि जलबन्दः नष्टः। अस्य भवान् कृषिक्षेत्रं गत्वा तत् निवारयतु। इति वदति।शिष्यः कृषिक्षेत्रं गच्छति। सर्वत्र पश्यति। एकत्र जलबन्दः नष्टः अस्ति। शिष्यः चिन्तयति। यत्र जलबन्दः नष्टः अस्ति तत्र मृत्तिकां स्थापयति। किन्तु जलप्रावाहः अधिकः अस्ति। इति कारणतः तत न तिष्ठति। बहुजलं तत्र गच्छति। अतः शिष्यः चिन्तयति, किम् करोमि।आम्। एवं करोमि। इति चिन्तयति। स्वस्य शरीरमेव तत्र स्थापयति, स्वशिरः स्थापयति। जलबंधं सम्यक करोति। एवं जलबंधं सम्यक् कर्त्तुं स्वशरीरं स्थापयित्वा तत्र जलबंधस्य समीकरणं करोति। किंचित् समयानन्तरं शिष्यः न आगतः। गुरु चिन्तयति। शिष्यः कुत्र गतः। न आगतः। इति चिन्तयित्वा कृषिक्षेत्रं गच्छति। तत्र पश्यति। शिष्यः जलबंधे स्वशरीरं स्थापयित्वा शयनं कृतवान् अस्ति। गुरुः तम् पश्यति। गुरोः शिष्यं दृष्टवा अतीव आनन्दः भवति। सः अतीव संतुष्टः तस्मै ज्ञानं ददाति। संतोषेण तम् आलिङ्गति च एवं स्वशरीरेण जलबंधनं समीकृत्य गुओः वच्नस्य परिपालनं कृतवान्। कर्त्तव्यं सम्यक कृत्वा समापितवान्। सद्वैत शिष्यः अस्ति आरुणिः इति। तस्य उद्दालकः इति अपरं नामधेयम् अस्ति। अहो शिष्यस्य कर्त्तव्यपरतः। कथायः अर्थ ज्ञातः किल।

सुभाषितम्
वयम् इदानीम् एकं सुभाषितं श्रुण्मः।

छायामन्यस्य कुर्वन्ति तिष्ठन्ति स्वयमातपे।
फलान्यापि परार्थाय वृक्षाः सत्पुरुषाः इव॥

वयम् इदानीं यत् सुभाषितं श्रुतवन्तः तस्य अर्थः एवम् अस्ति। अस्मिन् सुभाषित सुभाषितकारः वदति, वृक्षाः सत्पुरुषाः इव- वृक्षाः सत्पुरुषाः यथा परोपकारं कुर्वन्ति तथैव कुर्वन्ति। कथम् इत्युक्त्ते वृक्षाः स्वयम् आतपे तिष्ठन्ति, स्वयं कष्टम् अनुभवन्ति, किन्तु अन्येषां जनानां छायां कल्पयन्ति। छायाम् अन्यस्य कुर्वन्ति, तिष्ठन्ति स्वयं आतपे। तस्मिन् वृक्षे यानि फलानि भवन्ति तानि फलानि अपि वृक्षाः स्वयं न खादन्ति। फलानि अपि परार्थाय। एवमेव सत्पुरुषाः यत् सम्पादयन्ति तदपि अन्येषाम् निमित्तम्। समाजनिमित्तमेव ते एतस्य उपयोगं कुर्वन्ति\ अतः वृक्षाः सत्पुरुषा इव।
वयं पूर्वतन् पाठे पुरतः पृष्ठतः, अधः,, वामतः इत्यादिनम् अभ्यासं कृतवन्तः स्म। अर्थः ज्ञातः एव पुनः एकवारं तस्य विषये वयम् अभ्यासं कुर्मः।
भवत्याः नाम् किम्।
लक्ष्मीः कुत्र अस्ति।
विनोदः मम पृष्ठतः अस्ति।
आकाशः उपरि अस्ति।
भूमिः अधः अस्ति।
सङ्गणकस्य उपरि अस्ति।
विद्यालयः पुरुषस्य दक्षिणतः अस्ति।
फलं शकटस्य उपरि अस्ति।
कूपी अस्ति।
इतः नयतु।
भवान् ततः पुस्तकम् आनयतु।
तत किम।धनस्यूतः।
धनस्यूतः तत । अत्र प्रेषयतु।
मम न आवश्यकम्।
इतः नयतु।
इतः। ततः।
चषकः कुतः पतति।
चषकः हस्ततः पतति।
उपनेत्रम् हस्ततः न पतति।
फलं वृक्षतः पतति।
अहं गृहतः आगच्छामि।
भवति कुतः आगच्छति।
भवान् कुतः आगच्छति।
अहं विद्यालयतः आगच्छामि।
मन्दिरतः/ चित्रमंदिरतः/ ग्रामतः/ गृहतः/ ग्रंथालयतः/ अरण्यतः/ उज्जयनीतः/ काशीतः/ दिल्लीतः/ लखनऊतः/ चेन्नैतः/ चन्द्रलोकतः/ विदेशतः/ आगच्छमि।

नगरम्/ नगरतः
वनम्/ वनतः
ग्रामम्/ ग्रामतः
स्वर्गः/ स्वर्गतः
गृहम्/ गृहतः

अहं विद्यालयतः आगच्छामि।
न श्रुणोमि।
इदानीम् एकम्-एकं वाक्यं वदन्तु।
भवती एकं वाकयं वदतु।
न श्रुणोमि।
उच्चैः वदतु।
शुभाङ्गी शनैः वदति।
प्रसन्नः उच्चैः वदति।
सर्वे उच्चैः वदन्तु।
अहम् इदानीम् एकं सुन्दरं संस्कृत गीतं श्रवयामि।
सर्वे श्रुण्वन्तु। उच्चैः। शनैः।
कुक्कुरः उच्चैः भषति।
कुक्कुरः कथं भषति।
रेलयानं उच्चैः शब्दं करोति।
शिशुः/ बालकः उच्चैः रोदनं करोति।
प्रसन्नः कथं वदति।
प्रस्न्नः उच्चैः/ शनैः वदति।
सिंहः गर्जति।
अहं शीघ्रं गच्छामि।
अहं मन्दम् आगच्छामि।
अर्थः ज्ञायेत्। उत्तिष्ठतु। आगच्छतु।
एकं वाकयं लिखतु।
शीघ्रं लिखतु।
अहल्या शीघ्रं लिखति।
अहल्या कथं लिखति।
वयम् इदानीम् एकां क्रीडां क्रीडामः।
अहम् इदानीम् एकस्य गणस्य एकं सुधाखण्डं ददामि।
एतस्य गणस्य एकं सुधाखण्डं ददामि।
भवती सुधाखण्डं तस्यै ददातु।एवं दातव्यं सा तस्यै ददातु।
भवान् तस्मै ददातु।
सः तस्मै ददातु।
शीघं दातव्यम्। यः गणः शीघ्रं कार्यं समापयति तस्य जयः।
किन्तु दान समये शीघ्रम् इति वक्त्तव्यम्।
सुधाखण्डः भग्नः न भवेत्।
ज्ञातम्। आरम्भं कुर्मः।
स्वीकरोतु।
कथं गर्जति। भषति एवं प्रश्नः कुर्मः।
ममः केशालंकारः अस्ति।
इदानीं मम् केशालंकारः।
कथम् अस्ति। सम्यक् नास्ति।
अहं कथं लिखामि। सम्यक लिखामि।
माधुरी सम्यक गायति।
अहं प्रातःकाले षटवादने उत्तिष्ठामि।
अहं दशवादने भोजनं करोमि।
भोजने अहम् अन्नं/फलं खादामि।
अहं भोजने रोटिकां/फलं/पायसं खादामि।
अहम् अन्येन सह फलं खादामि।
भोजनस्य अंते दुग्धं पीबामि।


गीतम्

वर्षा आगच्छति झम् झम् झम्,
पतति बिन्दुः मम गृह मध्यम्।
नौका निर्मितकागदम् तरन्ति,
वर्षामध्ये बालाः स्नानं कुर्वन्ति।
न आगच्छति चेत् कृषकाः,
पश्यति आकशे पूजति पर्जन्यः।
हे पर्जन्य ददातु वर्षा,
आ जायताम् पच्यन्ताम् फलवत्यः,
कृषिः वर्द्धन्ति बालाः हसन्ति,
यत् वर्षा आगच्छन्ति झम् झम् झम्।
(अनुवर्तते)
c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

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