Sunday, July 27, 2008

विदेह 01 मई 2008 वर्ष 1 मास 5 अंक 9 6. पद्य अ.पद्य विस्मृत कवि स्व. श्री रामजी चौधरी (1878-1952)आ.पद्य गंगेश गुंजन.पद्य ज्योति झा चौधरी ई. गजेन्द्र

6. पद्य
अ.पद्य विस्मृत कवि स्व. श्री रामजी चौधरी (1878-1952)
आ.पद्य गंगेश गुंजन
इ.पद्य ज्योति झा चौधरी 1.मनुष्य आ' ओकर भावना 2.हम्मर गाम
ई.पद्य गजेन्द्र ठाकुर
विस्मृत कवि स्व. रामजी चौधरी (1878-1952)पर शोध-लेख विदेहक पहिल अँकमे ई-प्रकाशित भेल छल।तकर बाद हुनकर पुत्र श्री दुर्गानन्द चौधरी, ग्राम-रुद्रपुर,थाना-अंधरा-ठाढ़ी, जिला-मधुबनी कविजीक अप्रकाशित पाण्डुलिपि विदेह कार्यालयकेँ डाकसँ विदेहमे प्रकाशनार्थ पठओलन्हि अछि। ई गोट-पचासेक पद्य विदेहमे एहि अंकसँ धारावाहिक रूपेँ ई-प्रकाशित भ’ रहल अछि।
विस्मृत कवि- पं. रामजी चौधरी(1878-1952) जन्म स्थान- ग्राम-रुद्रपुर,थाना-अंधरा-ठाढ़ी,जिला-मधुबनी. मूल-पगुल्बार राजे गोत्र-शाण्डिल्य ।
जेना शंकरदेव असामीक बदला मैथिलीमे रचना रचलन्हि, तहिना कवि रामजी चौधरी मैथिलीक अतिरिक्त्त ब्रजबुलीमे सेहो रचना रचलन्हि।कवि रामजीक सभ पद्यमे रागक वर्ण अछि, ओहिना जेना विद्यापतिक नेपालसँ प्राप्त पदावलीमे अछि, ई प्रभाव हुंकर बाबा जे गबैय्या छलाहसँ प्रेरित बुझना जाइत अछि।मिथिलाक लोक पंच्देवोपासक छथि मुदा शिवालय सभ गाममे भेटि जायत, से रामजी चौधरी महेश्वानी लिखलन्हि आ’ चैत मासक हेतु ठुमरी आ’ भोरक भजन (पराती/ प्रभाती) सेहो। जाहि राग सभक वर्णन हुनकर कृतिमे अबैत अछि से अछि:
1. राग रेखता 2 लावणी 3. राग झपताला 4.राग ध्रुपद 5. राग संगीत 6. राग देश 7. राग गौरी 8.तिरहुत 9. भजन विनय 10. भजन भैरवी 11.भजन गजल 12. होली 13.राग श्याम कल्याण 14.कविता 15. डम्फक होली 16.राग कागू काफी 17. राग विहाग 18.गजलक ठुमरी 19. राग पावस चौमासा 20. भजन प्रभाती 21.महेशवाणी आ’ 22. भजन कीर्त्तन आदि।
मिथिलाक लोचनक रागतरंगिणीमे किछु राग एहन छल जे मिथिले टामे छल, तकर प्रयोग सेहो कविजी कएलन्हि।
प्रस्तुत अछि हुनकर अप्रकाशित रचनाक धारावाहिक प्रस्तुति:-
1.
भजन विनय
प्रभू बिनू कोन करत दुखः त्राणः॥
कतेक दुःखीके तारल जगमे भव सागर बिनू जल जान, कतेक चूकि हमरासे भ’ गेल सोर ने सिनई छी कानः॥ अहाँ के त बैनि परल अछि पतित उधारन नाम ।नामक टेक राखू प्रभू अबहूँ हम छी अधम महानः॥ जौँ नञ कृपा करब एहि जन पर कोना खबरि लेत आन। रामजी पतितके नाहिँ सहारा दोसर के अछि आनः॥

2.
भजन लक्ष्मी नारायण जीक विनय

लक्ष्मी नारायण अहाँ हमरा ओर नञ तकइ छी यौ।
दीनदयाल नाम अहाँके सभ कहए अछि यौ।
हमर दुःख देखि बिकट अहाँ डरए छी यौ।
ब्याध गणिका गिध अजामिल गजके उबारल यौ।
कौल किरात भिलनी अधमकेँ उबारल यौ।
कतेक पतितके तारल अहाँ मानि के सकत यौ।
रुद्रपुरके भोलानाथ अहाँ के धाम गेलायो।
ज्यों न हमरा पर कृपा करब हम कि करब यौ।
रामजी अनाथ एक दास राखु यौ।
3.
भजन विनय भगवती

जय जय जनक नन्दिनी अम्बे, त्रिभुवन के तू ही अवलम्बेः।
तुही पालन कारनी जगतके, शेष गणेश सुरन केः।
तेरो महिमा कहि न सकत कोउ, सकुचत सारभ सुरपति कोः।
परमदुखी एहि जगमे, के नञ जनए अछि त्रिभुवनमेः॥
केवल आशा अहाँक चरणके, राखू दास अधम केः॥
कियो नहि राखि सकल शरणोंमे, देख दुखी दिनन केः॥
जौँ नहि कृपा करब जगजननी, बास जान निज मनमे।
तौँ मेरो दुख कौन हटावत, दोसर छाड़ि अहाँकेः॥
कबहौँ अवसर पाबि विपति मेरो कहियो अवधपति को,
रामजी क नहि आन सहारा छाड़ि चरण अहाँकेः॥
(अनुवर्तते)
गंगेश गुंजन(1942- )। जन्म स्थान- पिलखबाड़, मधुबनी। एम.ए. (हिन्दी), रेडियो नाटक पर पी.एच.डी.। कवि, कथाकार, नाटककार आ' उपन्यासकार। मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक बुधिबधियाक लेखक। उचितवक्ता (कथा संग्रह) क लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार। एकर अतिरिक्त्त हम एकटा मिथ्या परिचय, लोक सुनू (कविता संग्रह), अन्हार- इजोत (कथा संग्रह), पहिल लोक (उपन्यास), आइ भोट (नाटक)प्रकाशित। हिन्दीमे मिथिलांचल की लोक कथाएँ, मणिपद्मक नैका- बनिजाराक मैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आ' शब्द तैयार है (कविता संग्रह)।
देश छोड़ि कत' गेल, देश छोड़ि कियेक गेलय ?

दिन केहन पहाड़ भेलय
कत कहां ऋतु औनायल
रस्ता अन्हार भेलय

चाही से गेल गाम
अनचाहल फेर आयल
बीच बाट पर तेना
आइ सूर्य ठाढ़ भेलय,
आगां अन्हार भेलय

कोनो ने समाद
कानो किछुओ सनेस नहि
जानि नहि केहन गँहींर उदेस की
ओना तं अयवाक किछु विशेष रहय
मन तें भदवरिया मेघक
अकास भेलय,
एखनहि बिन पानिक
कहार गेलय

कियेक एना कारी फूल
कियेक एना कोकनल फल
कियेक एना उष्ण बसात
एना कियेक अपस्याँत
गाम-घर,लोक, खेत-पथार
लोकक स्तब्ध मुखाकृति
डारि-पात हीन ठुठ्ठ गाछ
एतेक एना कियेक अनचिन्हार भेलय

हमर हृदय हमर प्राण केर आंगन
छोड़ि-छाड़ि बिन कहने-सुनने
कोन मृग मरीचिका मे आखिर से,
चुपचाप घरसँ बहार भेलय
देश छोड़ि कत' गेल,
देश छोड़ि कियेक गेलय ?


ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) आ' हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल।
ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्र्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ''मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी नानी भाई बहिन सभकेँ पत्र लिखबामे कएने छी। बच्चेसँ मैथिलीसँ लगाव रहल अछि। -ज्योति
1.मनुष्य आ' ओकर भावना
कठोर हृदयमे भावुकता नुकायल भेटल,
पुछलियै, “ तोहर आब कोन स्थान ?”
बड़ निर्मलतासॅं उत्तर देलक,
''हमरा सॅं नहिं तोरा सबके त्राण।

क्रोध, प्रेम, दु:ख, दया आदि जीवनक अंश
अहिसॅं पूर्णत: विमुक्त भेनाई कठिन;
परन्तु गलतकेँ बिसरा कऽ नीक विचारकेँ
आश्रय देनाय अछि अपन आधीन ।

दया परोपकारक अधिष्ठात्री अछि ,
दु:ख खुशीक महत्त्व बुझाबए छै।
क्रोध सॅं हठ, प्रेमसँ त्याग जनमैत अछि,
बस उचित दिशा निर्देशन आवश्यक छै।

मानवक बुद्धि भावनासॅं प्रभावित होइत अछि़ ;
भने ओ स्वयम्‌केँ विधाता बनओने फिरैए।
आधुनिकताक होड़मे निष्ठुरता ओढ़ने अछि,
भावनाहीन भऽ कऽ जीवित नहि रहि सकैए।
2.
हम्मर गाम
गरमी में सुर्योदय के समय कतेक शान्त आ' शीतल,
लू आ उमस सॅं ओत प्रोत दुपहरिया तेहने बिगड़ल;
सॉंझ हुअ सऽ पहिने धूल धक्कड़ आ' बिहारि,
राइत होति देरी अन्हार, ताहि पर मच्छड़क मारि।

अहि सबहक बीच बसल बस एक मात्र मिठास
अप्पन भाषाक ज देने अछि गाम जायक प्यास
जतऽ सभ्यता के लाज में अपनापन नहिं नुकाइत छल
लोक हाक दऽ कऽ हाल पूछऽ में नहिं सकुचाइत छल

अनार, शरीफा, खजूर, लताम, पपीता, जलेबी, केरा सहित लीचीक बगान
केसौर, कटहर, बेल, धात्री, जामुन, बेरक संग अप्पन पोखरिक मखान
फेर आमक गाछी सेहो अछि जतऽ गर्मी बितौनाई नहिं अखड़ल
हवा बिहारि में खसल आम बीछऽ लेल भगनाई नहिं बिसरल

गजेन्द्र ठाकुर

सपना

सपना,
सपना सुन्दर सुन्दर?

नञि, नञि छल ओतेक सुन्दर,
बच्चामे ई खूब डरओलक तोड़ैत,
आँखिसँ छिनैत सुतबाक उत्सुकता ,
जखन मोन उखड़ैत छल घबड़ाइत।

देश कालक सीमा बन्हलहुँ,
पुरखाक भ्रमकेँ अपनओने,
मुदा प्रथम बीजी-पुरुषक छद्म,
नहि छल जाइत मोनक भ्रम।

बचहनक मोनक-छाती धक-धक,
करैत छल खोज जगक जन्मक,
नहि पओने कोनो प्रश्नोत्तर,
छोड़ैत ईश्वर पर ई शाश्वत।

मुदा ईश्वरक मोन आ’ शाश्वत स्वरूपक,
नहि सोझ भेल ससरफानी पड़ल गिरह,
छाती-मोनक करैछ, बढ़ल जे धकधकी,
सपना सेहो नञि, जौँ अबैछ निन्न बेशी।

संसारकेँ सहबाक ईहो अछि प्रहेलिका,
बिनु समस्या समाधानक करैत छी,
हँसैत बिहुँसैत बनबैत सर्वोपरि भाग्यराजकेँ,
करैत छी सभटा अपने, आ’ ई छी कहैत,
कहैत जे हम छी भाग्यराजक कठपुतली।
ईश्वरक ई लीला? अछि मोनक छातीक संग,
भौतिक छातीकेँ सेहो, जे धकधकी ई बढ़बैत।

सपना सुन्दर आकि डरओन नहि कोनो,
अछि आब अबैत।


गजेन्द्र ठाकुर

सपना

सपना,
सपना सुन्दर सुन्दर?

नञि, नञि छल ओतेक सुन्दर,
बच्चामे ई खूब डरओलक तोड़ैत,
आँखिसँ छिनैत सुतबाक उत्सुकता ,
जखन मोन उखड़ैत छल घबड़ाइत।

देश कालक सीमा बन्हलहुँ,
पुरखाक भ्रमकेँ अपनओने,
मुदा प्रथम बीजी-पुरुषक छद्म,
नहि छल जाइत मोनक भ्रम।

बचहनक मोनक-छाती धक-धक,
करैत छल खोज जगक जन्मक,
नहि पओने कोनो प्रश्नोत्तर,
छोड़ैत ईश्वर पर ई शाश्वत।

मुदा ईश्वरक मोन आ’ शाश्वत स्वरूपक,
नहि सोझ भेल ससरफानी पड़ल गिरह,
छाती-मोनक करैछ, बढ़ल जे धकधकी,
सपना सेहो नञि, जौँ अबैछ निन्न बेशी।

संसारकेँ सहबाक ईहो अछि प्रहेलिका,
बिनु समस्या समाधानक करैत छी,
हँसैत बिहुँसैत बनबैत सर्वोपरि भाग्यराजकेँ,
करैत छी सभटा अपने, आ’ ई छी कहैत,
कहैत जे हम छी भाग्यराजक कठपुतली।
ईश्वरक ई लीला? अछि मोनक छातीक संग,
भौतिक छातीकेँ सेहो, जे धकधकी ई बढ़बैत।

सपना सुन्दर आकि डरओन नहि कोनो,
अछि आब अबैत।

(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...