Sunday, July 27, 2008

विदेह 01 मई 2008 वर्ष 1 मास 5 अंक 9 4.महाकाव्य महाभारत –गजेन्द्र ठाकुर(आँगा)

4.महाकाव्य
महाभारत –गजेन्द्र ठाकुर(आँगा) ------
2.सभा पर्व

संतोष भेलन्हि पाण्डव-जनकेँ ई सुनि,
कथा धृतराष्ट्रक घुरलाह इन्द्रप्रस्थ पुनि।

दुर्योधन दुःखित मंत्रणा कएल शकुनिसँ,
संग दुःशासन कर्णक मंत्रणा फेर जुआक,
विनाशक हस्तिनापुरक छल बेर खराप।

एहि बेरक नियम राखल हारत जे से करत,
बारह वर्षक वनवास आऽ एक वर्ष अज्ञातवास।

धृतराष्ट्र दूत पठाओल हस्तिनापुर फेर।
युधिष्ठिर घुरलाह भायक संग बेर-अबेर,
सुनाओल गेल शर्त्त सभ रोकल एक बेर।

मुदा भाग्यराजक आगाँ ककर अछि चलल,
नहि मानल कएल युधिष्ठिर भाग्यक खेल।

चलि फेर पासा दुर्योधनक,वैह खेरहा,
फेंकि गोटी जिताओल शकुनि ओकरा।

हारि हारल राज्य, पाओल छल बनबास,
युधिष्ठिरक भाग्य चालि कुचालिक जीत,
राज्यक निर्णय जुआक गोटीक संगीत,
की होएत से नञि जानि सुन्न अकास।

३. वन पर्व
धर्मराज सभ हारि,
चलल फेर वैह पथ,
धर्मक आ’ शान्तिक,
छोड़ि सभ बिसारि।

माता कुन्ती छलि वृद्धा भेलि कहल,
कहल धर्मराज नञि जाऽ सकब अहाँ,
विदुर काक केर घर जा’ रहब,
जाएब कर्म भोगए हम सभ।

द्रौपदीक पाँचू पुत्र आ’ पुत्र अभिमन्युक,
सुभद्रा जएतीह अपन नैहर द्वारकापुर।

धौम्यक पुरहित संग द्रौपदी आऽ चारू भाए,
काटब हम संग तेरह वर्षक वनवास जाय।

नगरवासी सुनि गमनक ई समाचार,
कएलन्हि दुर्-दुर दुर्योधनक अत्याचार।

जाएब हमहुँ सभ संग,धर्मराज आइ,
धर्मराज घुराओल सभकेँ बुझाए जाए।

सभ घुरि गेल मुदा,नहि घुरल ब्राह्मण जन,
पुरहित कहलन्हि उपासना सूर्यक एहि क्षण।
वैह दैत छथि अन्न-फल समग्र आर्य,
उपासनाक उपरान्त प्रगट भेलाह सूर्य।

देलन्हि अक्षय पात्र नहि कम होयत अन्न,
द्रौपदी सभ ब्राह्मणकेँ आऽ पाण्डवकेँ खोआबथि,
फेर खाथि, सभ अघाथि, नञि होए खतम,
जखन नञि होए खतम पात्रसँ खाद्यान्न।

युधिष्ठिर पहुँचि सरस्वती धारक कात,
काम्यक वनमे कएलन्हि निवास।

एहि बीच सुनैत पाण्डव-प्रशंसा मुँहसँ विदुरक,
धृतराष्ट्र निकालि हटाओल विदुरकेँ दरबार-मध्य।

ओहो आबि लगलाह रहए काम्यकवनमे,
पुनि पठाओल धृतराष्ट्र ओतए संजयकेँ।

पाण्डव-जनक बुझओला उत्तर विदुर,
धृतराष्ट्र सँग गेलाह पुनि दरबार घुरि।

ऋषि-मुनिक सत्संगसँ लैत शिक्षा आऽदीक्षा,
सुनैत छलाह कथा सरिता नल दमयन्तीक,
अगस्त्यक,ऋषि श्रृंग,अष्टावक्रक,लोपामुद्राक।

कृष्ण आबि बुझाओल ब्यास अएलाह,
ब्यास कहल युद्धक हेतु करू तैय्यारी,
बिनु इन्द्रक अमोघ शिवक पाशुपत्याह,
कोना लड़ब संग भीष्म द्रोण महारथी।
c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

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'विदेह' २३१ म अंक ०१ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३१)

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