Saturday, July 26, 2008

विदेह 01 अप्रैल 2008 वर्ष 1 मास 4 अंक 7 3. महाकाव्य महाभारत (आँगा)

3. महाकाव्य महाभारत (आँगा)
क्रोधित हृदय ईर्ष्याक वशमे छल दुर्योधनक,
शकुनि संग मंत्रणा कए क’ एकटा विचारल,
सोझे युद्धमे पांडवकेँ हरेनाइ अछि मुश्किल,
सोचि ई दोसर व्यूह रचलन्हि दुष्ट शकुनि।
भव्य सभा भवन एकटा हम सभ बनायब,
पाण्डव-जनकेँ देखबा लेल सेहो बजायब,
द्यूत खेलक छी महारथी हम गांधारवासी,
धृतराष्ट्रकेँ कहि आमंत्रित कराऊ बजाऊ।
भवन बनि कय तैयार भेल एके निसासी।
द्यूत खेलक आमंत्रणक हेतु धृतराष्ट्र विचारल।
विदुर कहल राजन् खेल करत विनाश सभकेँ,
दुर्योधनक अंधप्रेममे धृतराष्ट्र मुदा नहि मानल।
स्वयं विदुर गेलाह देबय निमंत्रण इंद्रप्रस्थ
, पाण्डव जनकेँ अयला पर भेल प्रेम-मिलन।
मुदा हृदयक विष बहराइत जल्दी कोना कए,
दुर्योधन लय गेलाह युधिष्ठिरकेँ सभा भवनमे।
द्यूतक चर्च सगरय होमय लगल छल ओतय,
शुकिनि माटि फेंकि कहल युधिष्ठिर भ’ जाय,
सकुचाइत छी क्षत्रिय भ’ करय छी अनुचित।
युधिष्ठिर तैयार जखने भेलाह,दुःशासन कहल,
ई खेल होयत यधिष्ठिर आ’ दुर्योधनक बिच,
मामा शकुनि पास फेंकताह दुर्योधनक दिशिसँ,
हुनक हारि जीत मानल जायत दुर्योधनक से,
दोसर दिन खेल भेल सभा भवनमे भारतक हे।
सभा भवन दर्शकसँ छल भरल,छल ओतय,
भीष्म,द्रोण,कृपाचार्य,विदुर,धृतराष्ट्र उपस्थित।
पहिने रत्नक बाजी,फेर चानी-सोनक लागल,
फेर छल सभक अश्व-रथ लागल जुआ पर ।
मुदा जकन तीनू टा बाजी युधिष्ठिर हारल,
सौँसे सेना लागाओल दाँव पर ओ’अभागल।
फेर बेर आयल राज्यक फेर चारू भाँय केर,
युधिष्ठिर बाजल नहि बचल लग हमरा लेल।
शकुनि कहल छथि द्रौपदी अहाँक बिचमे।
एहि बेर जौँ जीतब अहाँ, दए देब हम सभ,
भाइ,राज्यसेना,अश्व-रथ,रत्न चानी सोन सभ।
युधिष्ठिर सुनि ई भ’ गेल छल तैयार जखने,
हा। धिक्। पापकर्म की भय रहल अछि ई।
सभा बिच उठि पड़ल सभक नाद ई सभ।
युधिष्ठिर सेहो कहल हम की ई कएलहुँ।
आनन्द मग्न कौरव छल, मुदा संतप्त एकेटा,
दुर्योधन-भ्राता युयुत्सु छल शोकाकुल सएहटा,
शकुनि आब एहि सभक बीच, फेकलक पासा,
ई बाजी हमर,हुंकारलक शकुनि हारल युधिष्ठिर,
द्रौपदीकेँ हारि ठकायल ठाढ़ छल सभा बिच।
(अनुवर्तते)

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

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