Thursday, July 24, 2008

विदेह (दिनांक 01 मार्च, 2008) वर्ष: 1 मास: 3 अंक: 5 4.कथा 5. आर्या

4.कथा 5. आर्या
विवाहक उपरान्त ढ़ेरी-ढ़ाकी लोक हमरासँ भेँट करबाक हेतु सासुरमे आबि रहल छलाह। ताहिमे छलि एकटा नवम् कक्षाक छात्रा आर्या आ’ ओकर पितामही आ’ माय। ओ’ मायक संग नहि आबि असगरे आयल छलीह। खूब कारी, दुबर-पातर, आवश्यकतासँ बेशी अनुशासित आ’ शिष्ट आ’ नापि-जोखि कय बजनिहारि। हमरासँ सभ गपमे उलटा। हमर कनियाँ हुनकासँ हमर परिचय करओलन्हि, आ’ ओकर प्रशंसा सेहो कएलन्हि। किछु कालक बाद जखन ओकर पितामही आ’ माय हमरासँ भेँट करबाक हेतु अयलीह तँ हमरा अनुभव भेल, जे हुनकर पितामहीक तँ लेहाज राखल गेल छल मुदा हुनकर मायक अवहेलना सन हमर कनियाँ आ’ सासु द्वारा भेल छल। गप्पो करबामे ओ’ नीक छलीह आ’ जाइत-जाइत कहि गेलीह, जे हमरा सभ अहाँक ससुरक किरायादार छी, आ’ उपरका महला पर रहैत छी। से भीड़-भाड़ कम भेला पर अवश्य आऊ। ई गप्प जाइत-जाइत हमर सासु प्रायः सुनि लेलन्हि, से हमर पत्नीकेँ अस्थिरेसँ मुदा आज्ञार्थक रूपेँ कहलन्हि, जे ऊपर जयबाक कोनो जरूरी नहि छैक। हम पत्नीसँ पुछलियन्हि, जे बेचारी एतेक आग्रहसँ बजओलन्हि अछि। पत्नी कहलथि जे सुनलियैक नहि, माँ मना कएलन्हि अछि। कारण पुछला पर गप अन्ठा देलन्हि।
किछु दिनुका बादक घटना छी, अन्हरोखेमे गेटक झमाड़ि कय खुजबाक अबाज भेल। लागल जे क्यो पीबि कय बड़बड़ा रहल अछि। हमरा अतिरिक्त क्यो ओहि अबाज पर ध्यान नहि देलक, आ’ अन्ठयबाक स्वांग कएलन्हि। हम बाहर अएलहुँ तँ एकटा अधवयसु झुमैत अबैत दृष्टिगोचर भेलाह। हमरा देखि डोलैत हाथसँ जमायबाबू कहि नमस्कार कएलन्हि। अखन धरि हमरासँ भेँट नहि होयबाक कारण हमर पत्नीकेँ फड़िछओलन्हि आ’ डोलैत ऊपर सीढ़ीक दिशसँ चलि गेलाह। हमर पत्नी हाथ पकड़ि कय हमरा भीतर आनि लेलन्हि आ’ ईहो सूचना देलन्हि जे ईएह आर्याक पिता थीक। अनायासहि हमरा माथमे आयल जे रंग जे आर्याक छैक से पिते पर गेल छैक। बादमे हमर सासु ऊपर जा’ कय भाषण दए अयलीह आ’ एक महिनाक भीतर घर छोड़बाक अल्टीमेटम सेहो आर्याक परिवारकेँ दए देलन्हि। हमर सर कहलथि जे ई दसम अल्टीमेटम छैक, मुदा हमर सासु अडिग छलीह जे किछु भय जाय एहि बेर ओ’ नहि मानतीह। जमाय की भुझताह जे केहन भाड़ादार रखने छी। पहिने ठकिया-फुसिया कय बहटारि लैत छल। पुछला पर पता चलल जे आर्याक पिता डॉक्टर छैक, आ’ सेहो होमियोपैथिक, आयुर्वेदिक किंवा भेटनरी नहि वरन् एम. बी.बी.एस.। मुदा लक्षण देखियौक। ओना सासु ईहो गप कहलन्हि जे ई पीने रहबाक उपरान्तो गप्प एकोटा अभद्र नहि बजैत अछि, जेना आन पीनहार सभक संग होइत छैक। मनुक्खो ठीके अछि, मुदा यैह जे एकटा गड़बड़ी छैक से बड्ड भारी।अगला दिन नशा उतरलाक बाद पति-पत्नी दुनू गोटे नीचाँ अएलीह आ’ सासुकेँ कहलन्हि, जे आर्याक बोर्डक बाद ओ’ सभ पटना चलि जयतीह से हुनका सभक खातिर नहि मुदा आर्याक खातिर तावत रहय दिय’। घोँघाउजक बाद से मोहलति भेटि जाय गेलन्हि। तकरा बाद हुनकर पत्नीक नजरि हमरासँ मिलल तँ ओ’ कहलन्हि जे अहाँ तँ ऊपर नहिये आयब। आ’ एहि बेर ऊपर अयबाक आग्रहो नहि कएलथि। किछु दिन बीतल आ’ फेर सासुर जयबाक अवसर भेटल। किछु दिनमे पता चलल जे किरायादार बदलि गेल छथि। घरक लोक मात्र एतबे कहलथि जे आर्याक पिताक मृत्यु भ’ गेलन्हि आ’ अनुकम्पाक आधार पर ओकर मायकेँ नौकरी भेटि गेलैक। आब ओ’सभ क्यो पटनामे रहैत छथि। घरक लोक आगाँ किछु नहि कहलन्हि, मुदा कनियाँक एकटा पितयौत भाय आयल रहथि, से कहलथि जे डॉक्टरी रिपोर्टमे विष खा’ कय आत्महत्याक वर्णन अछि। फेर आँगा पति-पत्नीक मध्य मचल तुमुलक चर्च भेल। कनियाँ कहइत रहथिन्ह जे ई डॉक्टर बड्ड पिबैत छथि ताहि लेल झगड़ा होइत अछि, तँ डॉक्टर साहब कहथि जे झगड़ाक द्वारे पिबैत छी। अस्तु मृत्युक बाद हुनकर कनियाँक भाव एहन सन छल जेना मुक्ति भेटि गेल होय- एहि बातमे सभ क्यो एक मत रहथि।
फेर दिन बितैत रहल आ’ बादमे फोन पर समाचार भेटल जे आर्या सेहो आत्म हत्या कए लेलक। फेर बहुत रास बात मोनमे घूमि गेल। आर्या भावुक छलि, किछु बेशी तनावमे रहिते छलि। गपकेँ गंभीरतासँ लइत छलि। एकटा सारि रहथि, हुनकर बात सेहो मोन पड़ल। एक गोट युवकक विषयमे आर्या कहैत छलि, जे ओकर संगीकेँ होइत छैक जे ओ’ युवक ओकरासँ प्रेम करैत अछि। मुदा आर्याक मत छल जे ऊ’ युवक ओकरासँ नहि वरन् आर्यासँ प्रेम करैत छल। हम सारिकेँ कहने रहियन्हि जे आर्या बच्चा अछि, ओहिना हँसी कएने होयत। मुदा ओ’ कहलन्हि, जे नहि यौ। बड्ड भावुक अछि आर्या। कहैत अछि जे ओहि युवकके प्राप्त करबाक हेतु किछुओ करत। एहि बात पर हम तखन कोनो बेशी ध्यान नहि देने रहियैक। मुदा एहि बातक आब महत्त्व बढ़ि गेल छल। हम फोन दोबारा लगेलहुँ। पता चलल जे ओ’ युवक कोनो पुरान महारानीक बेटीक बेटा छी। ओकर माता शिक्षिका अछि, आ’ बाप मेरीनमे काज करैत अछि। साल-छह मास पर अबैत अछि। आ’ जखन अबैत छल तँ जे मास-पंद्रह दिन रहैत छल से मारि_पीटिमे बिता दैत छल। पूरा मोहल्लामे बदनामी छैक। मायक शील-स्वभाव बड्ड नीक, बोलीसँ फूल-झड़ैत छैक। बापकेँ तँ लोक चिन्हितो नहि छैक।खाली झगड़ाक अबाजे सुनैत अछि लोक। आर्याक संगीकेँ स्कूल बससँ उतरबा काल क्यो तंग कएने छल तँ ओ’ युवक सभकेँ मारि-पीटि कय भगा देने छल, आ’ एकर बाद आर्या एहि शहरसँ दूर भ’ गेल। ओ’ मायकेँ कहैत रहलि जे परीक्षा तक रहय दिय’, मुदा माय विमुक्त भेलाक बाद एको पल पुरान कटु-स्मृतिकेँ देखय-नहि चाहैत छलथिन्ह।हम फोन पर पुछलियन्हि जे ओहि युवकक विवाह आर्याक मृत्युसँ पहिने कतय भेल। तँ सासुरक लोक अचंभित पुछलन्हि, जे ओकर विवाह तँ भेल मुदा अहाँ कोना बुझलहुँ। पता चलल जे सिलीगुड़ी-दिशि कोनो कन्यागत छथि, आ’ ओ’ युवक अपन बाप जेकाँ घर-जमाय बनि रहबाक नियाड़ कएने अछि। एहि शहरक लोककेँ तँ विवाहक हकारो नहि भेटल। हम आर्याकेँ एकटा दृढ़ बालिका बुझैत रही। मुदा ओकर ‘किछुओ कड़य पड़त से करब’ केर अर्थ आब जा’ कय बुझलहुँ।

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'विदेह' २३१ म अंक ०१ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३१)

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