Thursday, June 19, 2008

भालसरिक गाछ:

भालसरिक गाछ: bhalsarik gachh
मीत भाइ शृंखलाक कथा-व्यंग्य:१. फूसि-फटक

“कोनो काज पड़लापर हमरासँ कहब। कलक्टरक ओहिठाम भोर-साँझक बैसारी होइत अछि हमर। घंटाक-घंटा बैसल रहैत छी, आबए लगैत छी तँ रोकि कए फेर बैसा लैत अछि, दोसर-दोसर गप सभ शुरू कए दैत अछि”।

“ठीक छैक भाइ जी। कोनो जरूरी पड़त तँ कहब। नाम की छन्हि हुनकर”।

“बड्ड नमगर नाम छन्हि, भा.प्र.से. प्रशांत। आब भा.प्र.से. केर पूर्ण रूप हुनकासँ के पुछतन्हि, से प्रशांते कहैत छन्हि”।

“भारतीय प्रशासनिक सेवाक संक्षिप्त रूप छैक भा.प्र.से., ई हुनकर नामक अंग नहि छन्हि”।

“अच्छा तँ फेर सैह होयतैक। ताहि द्वारे नेम-प्लेट पर नामक नीचाँमे लिखल रहैत छैक”।

“ठीक छैक भाइ जी। कोनो जरूरी पड़त तँ अहाँकेँ कहब”। मीत भाइक गप पर भाष्कर बाजल।

ओना भाष्करक अनुभव यैह छैक, जे जखन कोनो काज ककरोसँ पड़ैत छैक, तँ सभसँ यैह उत्तर भेटैत अछि-

“परुकाँ साल किएक नहि कहलहुँ, ककर-ककर काज नहि करएलहुँ। मुदा एहि बेर तँ कोनो जोगारे नहि अछि। कहियो कोनो काज नहि कहने छलहुँ आऽ आइ कहलहुँ तँ हमरासँ नहि भऽ पाबि रहल अछि। आऽ से जानि कचोट भऽ रहल अछि”।

आऽ जखन ओऽ ओतएसँ बहराइत छथि, तखन ई बाजल जाइत अछि-

“सत्यार्थीक बाल-बच्चा सभ बड़ टेढ़। कहियो घुरि कए नहि आयल छल भेँट करए। आऽ आइ काज पड़ल छैक तखन आयल अछि”।

भाष्करक बाबूजीक संगी एक दिन वात्सल्यसँ एक बेर कोनो बङ्गाली बाबूकेँ, भाष्करक सोँझामे एक गोट बड़ नीक गप कहने छ्लाह-

“देखू दादा। ई छथि भाष्कर। हमर अत्यंत प्रिय मित्र सत्यार्थीक बेटा”।

“हुनकर बेटा तँ बड्ड छोट छल”।

“यैह छथि। अहाँ बड्ड दिन पहिने देखने छलियन्हि तखन छोट छलाह, आब पैघ भए गेल छथि। कहैत छलहुँ जे हिनकर पिता हिनका लेल किछु नहि छोड़ि गेलाह। मुदा हमर पिताक मृत्यु १९६० ई. मे भेल छल आऽ हमरा लेल ओऽ नगरमे १२ कट्ठा जमीन, एकटा घर आऽ एकटा स्कूटर ओहि जमानामे छोड़ि गेल छलाह। आऽ जौँ ई बच्चा ककरो लग कोनो काजक हेतु जायत, तँ एकरा उत्तर भेटतैक जे परुकाँ किएक नञि अएलहुँ आऽ परोछमे कहतन्हि, जे काज पड़लन्हि तखन आयल छथि। मुदा एकरा जखन समस्या पड़लैक तखन अहाँकेँ पुछबाक चाही छल, मुदा से तँ अहाँ नहि पुछलियन्हि। आऽ अहाँक लग आयल अछि, तखन अहाँ उल्टा गप करैत छी। आऽ जौँ ई बच्चा सहायताक लेल नहि जायत आऽ अपन काज स्वयं कए लेत आऽ ओहि श्रीमानकेँ से सुनबामे आबि जएतन्हि, तँ उपकरि कए अओताह आऽ पुछथिन्ह जे काज भऽ गेल आकि नहि। कहलहुँ किएक नहि। आऽ तखन ई बच्चा कहत जे काज भऽ गेल, भगवानक दया रहल। से दादा क्यो कोनो काजक लेल आबए तँ बुझू जे कुमोनसँ आयल अछि आऽ समस्या भेले उत्तर आयल अछि आऽ तेँ ओकर सहायता करू”।

अस्तु मीत भाइक कथा आगू बढ़बैत छी।

भाष्कर कोनो काजे कलक्टरक ऑफिस गेल रहथि। गपशप भइए रहल छलन्हि आकि मीत भाइ धरधड़ाइत चैम्बरमे अएलाह। कलक्टर तमसा कए बाहर जएबाक लेल मीत भाइकेँ कहलखिन्ह। भाष्करक पीठ सोझाँ छल ताहि लेल मीत भाइ हुनका देखि-चीन्हि नहि सकलखिन्ह। बाहर रूमसँ निकलि स्टेनोक कक्षमे बैसि रहलाह। १०-१५ मिनटक बाद जखन भाष्कर बाहर निकललाह तँ स्टेनोक रूमसँ मीत भाइ बहराइत छलाह। एहि बेर मीत भाइक पीठ भाष्करक सोझाँ छलन्हि आऽ ताहि द्वारे एहि बेर सेहो दुनू गोटेमे सोझाँ-सोँझी नहि भऽ सकल।

डेरा पर जखन पहुँचलाह भाष्कर तखन मीत भाइ सेहो पाछाँ-पाछाँ पहुँचि गेलाह।

“कहू मीत भाइ। कतएसँ आबि रहल छी”।

“ओह। की कहू कलक्टर साहेब रोकि लेलन्हि। ओतहि देरी भऽ गेल”।

“हुनकर स्टेनोसँ सेहो भेँट भेल रहय?”

“नहि। ओना बहरएबाक रस्ता स्टेनोक प्रकोष्ठेसँ छैक। मुदा ओऽ सभ तँ डरे सर्द रहैत अछि”।

तखन भाष्करकेँ नहि रहल गेलन्हि आऽ एकटा खिस्सा सुनबए लगलाह ओऽ मीत भाइकेँ।

"मीत भाइ। सुनू, एकटा खिस्सा सुनबैत छी। तीन टा कारी कुकुर छल। एके रङ-रूपक। ओकरा सभकेँ मोन भेलैक जे गरमा-गरम जिलेबी मधुरक दोकान जाऽ कए खाइ। से बेरा-बेरी ओतए जएबाक प्रक्रम शुरू भऽ गेल।

"पहिने पहिल कुकुर पहुँचल ओहि दोकान पर। मालिक देखलकैक जे कुकुर दोकानमे पैसि रहल अछि, से बटखरा फेंकि कए ओकरा मारलक। बेचाराकेँ बड़ चोट लगलैक। मुदा जखन गाम पर पहुँचल तँ पुछला पर कहलक जे बड़ सत्कार भेल। बटखरासँ जोखि कए जिलेबी खएबाक लेल भेटल।

"दोसर कुकुर अपनाकेँ रोकि नहि सकल आऽ अपन सतकार करएबाक हेतु पहुँचि गेल मधुरक दोकान पर। रूप-रङ तँ एके रङ रहए ओकरा सभक, से मधुरक दोकानक मालिककेँ भेलैक जे वैह कुकुर फेरसँ आबि गेल अछि। ओऽ पानि गरम कए रहल छल। भरि टोकना धीपल पानि ओहि कुकुरक देह पर फेकलक। बेचारा कुकुर जान बचाऽ कए भागल। आब गाम पर पहुँचला पर फेरसँ ओकरा पूछल गेलैक, जे केहन सत्कार भेल।

“की कहू। गरमा-गरम जिलेबी छानि कए खुएलक। बड़ नीक लोक अछि मधुरक दोकानक मालिक”। बेचारा अपन लाज बचबैत बाजल।

"ई तँ ओहने सन छल जे एक बेर शिवलिंगकेँ दूध पीबाक सोर भेल छल। जे क्यो निकलैत छल शिवलिगकेँ दूध पिअओलाक बाद, पुछला पर कहैत छलाह जे महादेव हुनको हाथसँ दूध पिलन्हि। हमहु गेल रही। मन्दिरक बाहरक गलीमे दूधक टघार देखने रही। जौँ भगवान दूध पीबि रहल छथि, तँ ई टघार कतएसँ आयल। मुदा जखन शिवलिंग पर दूध चढ़ा कए बाहर निकललहुँ, तँ लोक सभ पुछय लगलाह जे भगवान दूध पीबि रहल छथि की? आब कहितहुँ जे नहि पीबि रहल छथि, तँ सभ कहितए जे ई पापी छथि। से सभक हाथसँ भगवान दूध पीबि रहल छथिन्ह आऽ एकरा हाथसँ पीबाक लेल मना कए देने छथिन्ह। से हमहुँ सभकेँ कहलियन्हि, जे भगवान हमरो हाथसँ दूध पीलन्हि।

"सैह परि ओहि कुकुर सभक भेल छल। आब आगाँ सुनू"। भाष्कर आगाँक खिस्सा शुरू कएलन्हि।

"दुनू कुकुर जिलेबी खाऽ कए आबि गेल। एक गोटेकेँ जोखि कए देलकैक आऽ दोसरकेँ तँ छानैत गेलैक आऽ दैत गेलैक जोखबो नहि कएलकैक। तेसर कुकुर ई सोचैत-सोचैत दोकान दिशि बिदा भेल, जे ओकर कोन तरहेँ सत्कार होमए बला छैक। साँझ भऽ रहल छल। मधुरक दोकानक मालिक दोकान बन्न करबाक सूरसार कए रहल छल। आब जे ओऽ कारी कुकुरकेँ देखलन्हि, तँ सौँसे देह पित्त लहड़ि गेलन्हि। हुनका भेलन्हि जे एके कुकुर बेर-बेर एतेक नीक सत्कार भेटलो पर घुरि-फिरि कए आबि रहल अछि। से ओऽ एहि बेर ओकरा लेल विशेष सत्कार करबाक प्रण कएलन्हि।

"जखने ओऽ कुकुर दोकानमे पैसल आकि दोकानक मालिक दरबज्जा भीतरसँ बन्न कए डंटासँ कुकुरकेँ पुष्ट ततारलन्हि। फेर रस्सामे बान्हि दोकानक भीतरमे छोड़ि दोकान बाहरसँ बन्न कए गाम पर चलि गेलाह। बेचारा कुकुर बड्ड मेहनतिसँ बनहन तोड़ि बाहर भेल आऽ नेङराइत गाम पर पहुँचल। जखन सङी-साथी सभ सत्कारक मादी पुछलकन्हि, तखन ओऽ कहलन्हि जे की कहू, खोआबैत-खोआबैत जान लए लेलक। जखन कहियैक जे गाम पर जाए दियऽ तँ कहए जे आउर खाऊ, आउर खाऊ। आबइये नहि दैत छल। ततेक खोअएलक जे चल नहि भऽ रहल अछि।

“से मीत भाइ, जखन कलक्टर अहांकेँ दबाड़ि रहल छल तखन ओकरा सोझाँ हमही बैसल छलहुँ। हमर पीठ अहाँक सोझाँ छल तेँ अहाँ हमरा नहि देखि सकलहुँ। फेर अहाँ स्टेनोक प्रकोष्ठमे किछु काल बैसलहुँ आऽ जखन ओतएसँ बाहर निकललहुँ तँ लोक सभकेँ भेल होएतैक, जे अहाँ कलक्टरसँ ओतेक काल धरि गप कए रहल छलहुँ। मुदा कोनो बात नहि। हम ई ककरो नहि कहबैक। मुदा आजुक बाद मिथ्या कथनसँ अहाँ अपनाकेँ दूर राखू।

"बाजू मुरहीक भुज्जा बनाऊ? माए आइये पठओलन्हि अछि,खाएब”?

मीत भाइ मूरी गोतने "हँ" मे मूरी डोलओलन्हि।

मीत भाइ शृंखलाक कथा-व्यंग्य:२. पसीधक काँट भाग १
मीत भाइककेँ पसीधक काँट नहि गड़लन्हि, ई काँट ककरो गड़ि गेल होए, ई सुनबामे नञि अबैत अछि। ई काँट किछु आन कारणसँ प्रसिद्ध अछि। पसीधक काँट मिथिलाक बोनमे आब साइते उपलब्ध छैक। हम जखन बच्चा रही तँ ई काँट देखने रही मुदा एहि बेर जे गेलहुँ तँ क्यो कहय जे आब ई काँट नहि भेटैत छैक। मुदा जयराम कहलन्हि जे बड़ मेहनतिसँ तकला पर भेटि जाइत छैक। जेना आगाँ कथा-व्यंग्यमे सेहो चर्च अछि, पसीधक काँट उज्जर बिखाह रसक लेल प्रसिद्ध अछि, जे पीलासँ मृत्यु धरि भए जाइत अछि, आऽ बेशी दिन नहि २५-३० साल पहिने धरि गाममे बेटा मायकेँ झगड़ाक बाद ई कहैत सुनल जाइत छलाह जे देखिहँ एक दिन पसीधक रस पीबि मरि जएबौक गञि बुढ़िया। आब सुनू मीत भाइक खोरष।-गजेन्द्र ठाकुर


मीत भाइक खिस्सा की कहब। गामसँ निकललथि आऽ लाल काका लग दिल्ली पहुँचलाह नोकरी करबाक हेतु, मुदा यावत लाल काका-काकी लग रहलाह, तावत कनैत-कनैत हुनका लोकनिकेँ अकच्छ कऽ देलखिन्ह।

मीत भाइ यावत गाममे रहथि, तँ भरि दिन उकठपन करैत रहथि। से कथाक बीचमे हमरा जेना-जेना मोन पड़ैत जायत, तेना-तेना हम हुनकर उकठपनक खोरिष कहैत रहब। जौँ मीत भाइक खिस्सा सुनबाक होए तँ यावत ई-सभ अहाँकेँ बुझल नहि रहत तावत धरि नहिये खिस्सा नीक लागत आऽ नहिये बुझबामे आएत।

तँ मीत भाइ उकट्ठी छलाह से सिद्ध भेल। आहि रे बा। उकठपनक एकोटा खिस्सा सुनबे नहि कएलहुँ आऽ मानि लेलहुँ जे सिद्ध भए गेल तँ सुनू।

मीत भाइ यावत गाममे रहथि उकठपनी करैत रहैत छलाह। एक बेर पसीधक काँटक रस पोखड़िमे दऽ कए पोखरिक सभटा माँछ मारि देने रहथि। मुदा ई तँ पसीधक रससँ जुड़ल हुनकर एकटा छोट अपराध छल। पसीधक काँटसँ जुड़ल हुनकर एकटा पैघ अपराधक चर्च आगाँ आब होएत जाहिसँ सौँसे गाम दहसि गेल छल।

एक बेर पुबाड़ि टोलक कोनो बच्चाक मोन खराप भेलैक, तँ हिनका सँ अएलन्हि पुछबाक हेतु जे कोन दबाइ दियैक। मीत भाइ पसीधक काँटक रस पियाबय कहलखिन्ह। आऽ ई दबाइ कहि मीत भाइ महीँस चरेबाक हेतु डीह दिशि चलि गेलाह।

एक गोट दोसर मँहीसबार गाम परसँ अबैत देखाऽ पड़लन्हि मीत भाइकेँ, तँ पुछलखिन्ह-जे

"हौ बाउ, पुबाड़ि टोल दिशि सँ कोनो कन्नारोहटो सुनि पड़ल छल अबैत काल"?

बुझू। मीत भाइ एक तँ गलत कारण बतओने छलाह आऽ फेर ओकर दुष्परिणामक सेहो अहलदिलीसँ बाट जोहि रहल छलाह। एहि घटनासँ बड़ थू-थू भेलन्हि गाममे मीत भाइक। ओऽ तँ धन रहल जे मरीजक बाप जखन कलमसँ पसीधक काँट नेने घुरि रहल छलाह तँ रस्तामे क्यो भेँटि गेलन्हि आऽ पूछि देलकन्हि। नहि तँ ओऽ अपन बच्चासँ हाथ धोबय जाऽ रहल छलाह।

मीत भाइ एहि घटनाक बाद कंठी लऽ लेलन्हि। माने आब माँछ-मौस नहि खायब, ई प्रण कएलन्हि। मुदा घरमे सभ क्यो माँछ खूब खाइत छलन्हि। एक बेर भोरे- भोर खेत दिशि कोदारि आऽ छिट्टा लए बिदा भेलाह मीत भाइ। बुन्ना-बान्नी होइत छल, मुदा आड़िकेँ तड़पैत एकटा पैघ रोहुकेँ देखि कए कोदारि चला देलन्हि। आऽ रोहु दू कुट्टी भऽ गेल। दुनू ट्कड़ीकेँ माथ पर उठा कए विदा भेलाह मीत भाइ गाम दिशि। तकरा देखि गोनर भाय गाम पर जाइत काल बाबा दोगही लग ठमकि कए ठाढ़ भए गेलाह। आब फेर मोसकिल। पहिने बाबा दोगहीक अर्थ बुझि लिअ। नहि तँ कथा फेर बुझबामे नहि आएत।

‘बाबा दोगही’ मीत भाइक टोलकेँ गौँआ सभ ताहि हेतु कहैत छल,कारण जे क्यो बच्चो ओहि टोलमे जनमैत छ्ल से संबंधमे गौँआ सभक बाबा होइत छल।

आब कथा आगाँ बढ़ाबी। गोनर भाइ मोनमे ई सोचैत रहथि, जे वैष्णव जीसँ रोहु कोना कए लए ली। आऽ ओऽ ई सोचि बजलाह।

“यौ मीत भाइ। ई की कएलहुँ। वैष्णव भऽ कए माछ उघैत छी”।

”यौ माछ खायब ने छोड़ने छियैक। मारनाइ तँ नञि ने”। मीत भाइ बजलाह।

अपन सनक मुँह लए गोनर भाइ विदा भए गेलाह।

एहिना एक दिन गोनर झा टेलीफोन डायरी देखि रहल छलाह, तँ हुनका देखि मीत भाइ पुछलखिन्ह-

“की देखि रहल छी”।

गोनर झा कहलखिन्ह- जे

“टेलीफोन नंबर सभ लिखि कए रखने छी, ताहिमे सँ एकटा नंबर ताकि रहल छी”।

“ आ’ जौँ बाहरमे रस्तामे कतहु पुलिस पूछि देत जे ई की रखने छी तखन”।

“ ऐँ यौ से की कहैत छी। टेलीफोन नंबर सभ सेहो लोक नहि राखय”।

”से तँ ठीक मुदा एतेक नंबर किएक रखने छी, पुछला पर जौँ जबाब नहि देब तँ आतंकी बुझि जेलमे नहि धए देत”।

”से कोना धए देत। एखने हम एहि डायरीकेँ टुकड़ी-टुकड़ी क’ कए फेंकि दैत छियैक”।

आ’ से कहि गोनर भाइ ओहि डायरीकेँ पाड़-फूड़ि कए फेंकि देलखिन्ह।

मीत भाइ शृंखलाक कथा-व्यंग्य:२. पसीधक काँट भाग २
मीत भाइक विवाह

मीत भाइक चरचा सौँसे परोपट्टामे पसरि गेल छल। सुनामे नाम आकि कुनामे नाम। से घटक सभ हिनका चन्सगर बालकक रूपमे विख्यात कए देलकन्हि। आब मीत भाइक बगेबानीक चरचा करब। लिकलिक करैत भूत सन कारी रंग, कतेक कारी से ओहि खापड़िकेँ देखि लिअ ततेक। आकि घड़ीक करिया चमड़ाक बेल्ट देखि लिअ ओतेक।


एक दिन मीत भाए भोरे-भोर पोखड़ि दिशि जाइत रहथि तँ जगन्नाथ भेटलखिन्ह, गोबड़ काढ़ि रहल छलाह। कहलखिन्ह,

” यौ मीत भाइ, हमरे जेकाँ अहूँ सभकेँ भोरे-भोर गोबड़ काढ़य पड़ैत अछि ?”

मीत भाइ देखलन्हि जे हुनकर कनियो बगलमे ठाढ़ि छलखिन्ह। से एखन किछु कहबन्हि तँ लाज होएतन्हि। से बिनु किछु कहने आगू बढ़ि गेलाह। जखन घुरलाह तँ एकान्त पाबि जगन्नाथकेँ पुछलखिन्ह-,

“भाइ, पहिने बियाहमे पाइ देबय पड़ैत छलैक, से अहाँकेँ सेहो लागल होयत। ताहि द्वारे ने उमरिगरमे बियाह भेल”।

”हँ से तँ पाइ लागले छल”।

”मुदा हमरा सभकेँ पाइ नहि देबय पड़ल छल आऽ ताहि द्वारे गोबरो नहि काढ़य पड़ैत अछि, कारण कनियाँ ओतेक दुलारू नहि अछि”।

एक बेर बच्चा बाबूक ओहिठाम गेलाह मीत भाइ। ओऽ पैघ लोक आऽ तेँ बड्ड कँजूस। पहिने तँ सर्दमे गुरसँ होएबला लाभक चर्च कएलन्हि, जे ई ठेही हँटबैत अछि आऽ फेर गूरक चाह पीबाक आग्रह।

मुदा मीत भाए कहि देलखिन्ह जे गुरक चाह तँ हुनको बड्ड नीक लगैत छन्हि। मुदा परुकाँ जे पुरी जगन्नाथजी गेल छलाह, से कोनो एकटा फल छोड़बाक छलन्हि से कुसियार छोड़ि देलन्ह। आऽ कुसियारेसँ तँ गुर बनैत छैक। ओहि समयमे चुकन्दरक पातर रसियन चीनी अबैत छल, से बच्चा बाबूकेँ तकर चाह पिआबय पड़लन्हि।

किछु दिन पहिने बच्चा बाबू एहि गपक चर्च कएने छलाह जे ओऽ जोमनी छोड़्ने छलाह तीर्थस्थानमे आऽ तैँ जोम खाइत छलाह। हरजे की एहिमे। एकर मीत भाइ खूब नीक जबाब देलन्हि एहि बेर। अधिक फलम् डूबाडूबी।

अपने लोकनि मीत भाइक बुधियारी किंवा कबिलपनीक चरचा सुनलहुँ। मुदा मीत भाइक ई सरल जीवन बियाहक बाद, वा कहू बेटाक पैघ भेलाक बाद कनेक कालक लेल हिलकोर लेलकन्हि। भेल ई जे मीत भाइक बेटा भागि गेलन्हि।

मीत भाइक बेटा भागि गेलन्हि, आऽ ई क्यो पुछन्हि तँ पुछला पर मीत भाइखा कोढ़ फाटि जाइत छलन्हि।

“यौ,लोक सभ यौ लोक सभ। लाल काका बियाह तँ कराऽ देलन्हि, मुदा तखन ई कहाँ कहलन्हि जे बियाहक बाद बेटो होइत छैक”।

आब मीत भाइ बेटाकेँ ताकए लेल आऽ बेटाक नहि भेटला उत्तर अपना लेल नोकरी तकबाक हेतु दिल्लीक रस्ता धेलन्हि।

दिल्लीक रस्तामे मीत भाइक संग की भेलन्हि हुनकर बुधियारी आकि कबिलपनी काज अएलन्हि वा नहि, एहि लेल कनेक धैर्य राखए पड़त। कारण ट्रेनक सवारी अछि आऽ बजनहार उत्साहित छथि मुदा सुननहार थाकल बुझि पड़ैत छथि।
मीत भाइ शृंखलाक कथा-व्यंग्य:२. पसीधक काँट भाग ३
मीत भाइक दिल्ली यात्रा आऽ आगाँ



“यौ,लोक सभ यौ लोक सभ। लाल काका बियाह तँ कराऽ देलन्हि, मुदा तखन ई कहाँ कहलन्हि जे बियाहक बाद बेटो होइत छैक”।

आब मीत भाइ बेटाकेँ ताकए लेल आऽ बेटाक नहि भेटलाक स्थितिमे अपना लेल नोकरी तकबाक हेतु दिल्लीक रस्ता धेलन्हि।

मुदा एहि बेर तँ मीत भाइ फेरमे पड़ि गेलाह। बुधि जेना हेरा हेल छलन्हि, वा अपनासँ बेशी बुधियार लोकनिसँ सोझाँ-सोझी भए जाइत छलन्हि। अहाँ कहब जे पहिने की भेल से तँ कहबे नञि कएलहुँ तखन हमरा सभ कोना बुझब जे की भेल। तँ सुनू, एकर उत्तर सेहो हमर लग अछि। हम एहि कठाक कथाकार छी से हमरा सभटा बुझल अछि जे की होएबला अछि। ओना यावत हम कथा सुनबैत रहब तावत बीचोमे पुरनका प्लॉटसँ हटि कए हम कथा कहए लागब। मुदा विश्वास करू जे कठा चहटगर बनाबए लेल हम ई करब। हमर अपन कोनो स्वार्थ एहिमे नहि रहत।

तँ आगाँ बढ़ी। जखने दरभंगासँ ट्रेन आगू बढ़ल तँ मीत भाइक सरस्वती मंद पड़ए लगलन्हि। कनेक ट्रेन आगू बढ़ल तँ एकटा बूढ़ी आबि गेलीह, मीत भाइकेँ बचहोन्ह देखलखिन्ह तँ कहए लगलीह -

“बौआ कनेक सीट नञि छोड़ि देब”।

तँ मीत भाइ जबाब देलखिन्ह-,

“माँ। ई बौआ नहि। बौआक तीन टा बौआ”।

आऽ बूढ़ी फेर मीत भाइकेँ सीट छोड़बाक लेल नहि कहलखिन्ह।

मीत भाइ मुगलसराय पहुँचैत पहुँचैत शिथिल भए गेलाह। तखने पुलिस आयल बोगीमे आऽ मीत भाइक झोड़ा-झपटा सभ देखए लगलन्हि। चेकिंग किदनि होइत छैक से। ताहिमे किछु नहि भेटलैक ओकरा सभकेँ। हँ खेसारी सागक बिड़िया बना कए मीत भाइक कनियाँ सनेसक हेतु देने रहथिन्ह, लाल काकीक हेतु। मुदा पुलिसबा सभ एहिपर लोकि लेलकन्हि।

”ई की छी”।

”ई तँ सरकार, छी खेसारीक बिड़िया”।

”अच्छा, बेकूफ बुझैत छी हमरा। मोहन सिंह बताऊ तँ ई की छी”।

” गाजा छैक सरकार। गजेरी बुझाइत अछि ई”।

”आब कहू यौ सवारी। हम तँ मोहन सिंहकेँ नहि कहलियैक, जे ई गाजा छी। मुदा जेँ तँ ई छी गाजा, तेँ मोहन सिंह से कहलक”।

”सरकार छियैक तँ ई बिड़िया, हमर कनियाँ सनेस बन्हलक अछि लाल काकीक..........”

” लऽ चलू एकरा जेलमे सभटा कहि देत”। मोहन सिंह कड़कल।

मीत भाइक आँखिसँ दहो-बहो नोर बहय लगलन्हि। मुदा सिपाही छल बुझनुक। पुछलक
“कतेक पाइ अछि सँगमे”।

दिल्लीमे स्टेशनसँ लालकाकाक घर धरि दू बस बदलि कए जाए पड़ैत छैक। से सभ हिसाब लगाऽ कए बीस टाका छोड़ि कए पुलिसबा सभटा लऽ लेलकन्हि। हँ खेसारीक बिड़िया धरि छोड़ि देलकन्हि।

तखन कोहुनाकेँ लाल काकाक घर पहुँचलाह मीत भाइ।

मुदा रहैत रहथि, रहैत रहथि की सभटा गप सोचाऽ जाइत छलन्हि आऽ कोढ़ फाटि जाइत छलन्हि। तावत गामसँ खबरि अएलन्हि जे बेटा गाम पर पहुँचि गेलन्हि। मीत भाइ लाल काकी लग सप्पथ खएलन्हि जे आब पसीधक काँट बला हँसी नहि करताह। “नोकरी-तोकरी नहि होयत काकी हमरासँ” ई कहि मीत भाइ गाम घुरि कए जाय लेल तैयार भऽ गेलाह। मुदा लालकाकी दिल्ली घुमि लिअ, लाल किला देखि लिअ, ई कहि दू-चारि दिनक लेल रोकि लेलखिन्ह। मुदा असल गप हमरा बुझल अछि। लालकाकी हुनकासँ गामघरक फूसि-फटक सुनबाक लेल रोकने छलखिन्ह।

मीत भाइ शृंखलाक कथा-व्यंग्य:३. मीत भाइ आऽ लालकिलाक भारत रत्न सभ

अपन मित्रकेँ लाल काकीक घरक सीढ़ीसँ नीचाँ उतरैत हुनकर चमचम करैत जुत्ताकेँ देखि ओकर निर्माता कंपनी,ब्राण्ड आऽ मूल्यक संबंधमे जिज्ञासा कएलहुँ। आब अहाँ कहब जे मित्रक नाम किएक नहि कहि रहल छी, तँ सुनू हमर एकेटा मित्र छथि। आऽ से छथि जे अपन तरहक एकेटा छथि, आऽ से छथि मीत भाइ।

आब आगाँ बढ़ी। मीत भाइ हमर जिज्ञासा शांत करबाक बदला भाव-विह्वल भय गेलाह आऽ एकर क्रयक विस्तृत विवरण कहि सुनओलन्हि।


भेल ई जे दिल्लीक लाल किलाक पाछूमे रवि दिन भोरमे जे चोर बजार लगैत अछि, ताहिमे मीत भाइ अपन भाग्यक परीक्षणक हेतु पहुँचलाह। सभक मुँहसँ एहि बजारक इमपोर्टेड वस्तु सभक कम दाम पर भेटबाक गप्प सुनैत रहैत छलाह आऽ हीन भावनासँ ग्रस्त होइत छलाह। मीत भाइकेँ एहि बजारसँ, सस्त आऽ नीक चीज, किनबाक लूरि नहि छन्हि से हम कहैत छलियन्हि।

ओहि परीक्षणक दिन, मीत भाइक ओतय पहुँचबाक देरी छलन्हि आकि एक गोटे मीत भाइक आँखिसँ नुका कय किछु वस्तु राखय लागल आऽ देखिते-देखिते ओतएसँ निपत्ता भय गेल। मीत भाइक मोन ओम्हर गेलन्हि आऽ ओऽ ओकर पाछाँ धय लेलन्हि। बड्ड मुश्किलसँ मीत भाइ ओकरा ताकि लेलन्हि। जिज्ञासा कएलन्हि जे ओऽ की नुका रहल अछि।

“ ई अहाँक बुत्ताक बाहर अछि ”। चोर बजारक चोर महाराज बजलाह।

“अहाँ कहूतँ ठीक, जे की एहन अलभ्य अहाँक कोरमे अछि”।

तखन झाड़ि-पोछि कय विक्रेता महाराज एक जोड़ जुत्ता निकाललन्हि, मुदा ईहो संगहि कहि गेलाह, जे ओऽ कोनो पैघ गाड़ी बलाक बाटमे अछि, जे गाड़ीसँ उतरि एहि जुत्ताक सही परीक्षण करबामे समर्थ होयत आऽ सही दाम देत।

हमर मित्र बड्ड घिंघियेलथि तँ ओऽ चारिसय टाका दाम कहलकन्हि।

हमर मीत भाइक लगमे मात्र तीन सय साठि टाका छलन्हि, आऽ दोकानदारक बेर-बेर बुत्ताक बाहर होयबाक बात सत्त भय रहल छल।

विक्रेता महाराज ई धरि पता लगा लेलन्हि, जे क्रेता महाराजक लगमे मात्र तीन सय साठि टाका छन्हि आऽ दस टाका तँ ई सरकारी डी.टी.सी. बसक किरायाक हेतु रखबे करताह। से मुँह लटकओने मीत भाइक मजबूरीकेँ ध्यानमे रखैत ओऽ तीन सय पचास टाकामे, जे हुनकर (चोर बजारक चोर विक्रेता महाराज) मुताबिक मूरे-मूर छल,जुत्ता देनाइ गछलखिन्ह। विक्रेता महाराज जुत्ताकेँ अपन कलेजासँ हटा कय हमर मित्रक करेज धरि पहुँचा देलन्हि।

आब आगाँ हमर मित्रक बखान सुनू।

“से जाहि दिनसँ ई जुत्ता आयल, एकरामे पानि नहि लागय देलियैक। कतओ पानि देखी तँ पैरके सरा दैत रही आऽ एहि जुत्ताकेँ हाथमे उठा लैत छलहुँ। चारिये दिनतँ भेल रहय, एक दिन लाल काकीक घरक एहि सीढ़ीसँ उतरैत रही, तखने जुत्ताक पूरा सोल, करेज जेकाँ, अपन एहि आँखिक सोझाँ जुत्तसँ बाहर आबि गेल।

"मित्र की कहू? क्यो जे एहि जुत्ताक बड़ाइ करैत अछि, तँ कोढ़ फाटय लगैत अछि। कोनहुना सिया-फड़ा कय पाइ ऊप्पर कय रहल छी। बड्ड दाबी छल, जे मैथिल छी आऽ बुधियारीमे कोनो सानी नहि अछि। मुदा ई ठकान जे दिल्लीमे ठकेलहुँ, तँ आब तँ एतुक्का लोककेँ दण्डवते करैत रहबाक मोन करैत अछि। एहि लालकिलाक चोर-बजारक लोक सभतँ कतेको महोमहापाध्यायक बुद्धिकेँ गरदामे मिला देतन्हि। अउ जी, भारत-रत्न बँटैत छी, आऽ तखन एहि पर कंट्रोवर्सी करैत छी। असल भारत-रत्न सभ तँ लालकिलाक पाँछाँमे अछि, से एक दू टा नहि वरन् मात्रा मे"।

फेर बजैत रहलाह-

“आन सभतँ एहि घटनाकेँ लऽ कय किचकिचबैते रहैत अछि, कम सँ कम यौ भजार, अहाँ तँ एहि घटनाक मोन नहि पारू ”।

आब हमरा तँ होय जे हँसी की नहि हँसी। फेर दिन बीतल मीत भाइ गाम चलि गेलाह। आऽ हम प्रोग्रामे बनबैत रहि गेलहुँ जे नहि तँ अगिला रविकेँ चोर बजारक आकि मीना बजारक दर्शन करब। मुदा पता लागल अछि, जे पुलिस एहि बजारकेँ बन्द कए देलक।

No comments:

Post a Comment

"विदेह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका http://www.videha.co.in/:-
सम्पादक/ लेखककेँ अपन रचनात्मक सुझाव आ टीका-टिप्पणीसँ अवगत कराऊ, जेना:-
1. रचना/ प्रस्तुतिमे की तथ्यगत कमी अछि:- (स्पष्ट करैत लिखू)|
2. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो सम्पादकीय परिमार्जन आवश्यक अछि: (सङ्केत दिअ)|
3. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो भाषागत, तकनीकी वा टंकन सम्बन्धी अस्पष्टता अछि: (निर्दिष्ट करू कतए-कतए आ कोन पाँतीमे वा कोन ठाम)|
4. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो आर त्रुटि भेटल ।
5. रचना/ प्रस्तुतिपर अहाँक कोनो आर सुझाव ।
6. रचना/ प्रस्तुतिक उज्जवल पक्ष/ विशेषता|
7. रचना प्रस्तुतिक शास्त्रीय समीक्षा।

अपन टीका-टिप्पणीमे रचना आ रचनाकार/ प्रस्तुतकर्ताक नाम अवश्य लिखी, से आग्रह, जाहिसँ हुनका लोकनिकेँ त्वरित संदेश प्रेषण कएल जा सकय। अहाँ अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर सेहो पठा सकैत छी।

"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि।
अपन टीका-टिप्पणी एतए पोस्ट करू वा अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ।

'विदेह' २३१ म अंक ०१ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३१)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक चारिटा लघु कथ ा २.२. रबिन्‍द्र नारायण मिश्रक चारिटा आलेख ...