Tuesday, June 10, 2008

मोन पौडेत ऐच्छ कलम गाछी

मोन पौडेत ऐच्छ,
आम के कलम,
ओग्रैये छलौं ,
दिन - राईत,
नहिं आब रहलौं,
हम गाम के,
नहिं आब औ ,
गाछ छईथ ॥

सोन्हा-बेलवा, मालदा -कलकतिया,
सिन्दुरिया आ कृष्न्भोग,
कीछ सुखायल , किछ मुर्झायल,
सब गाछ में लागल रोग॥

हमरा मोन ऐच्छ नीक जकाँ,
आम गाछ मजरल जहाँ,
पटिया गेरुआ ल सब भागल गाछी ,
गाम पर रुकल कियो कहाँ ॥

फेर त कियो टिकुला बीछैत,
कियो जोगाड़ में गोपी के,
आन्हर बीहैएर में कियो गमछा भैरेय,
कियऊ मोटरी बनाबे धोती के॥

खट्टा चटनी कुच्चा अचार,
त कियो बेहाल ऐच्छ अम्मत्त में,
आब त गाछी सुनसान पडल ऐच्छ,
जेना ठाढ़ छी मरघट में...




सत्ते हमरा त गाम के कलम-गाछी बड मोन पदैत ऐच्छ, आ अहाँ के

एही चिट्ठा पर हमर अगला पन्ना : सब ठाम रहैत छाईथ एक टा कट्ठ्पिंगल...



9 comments:

  1. श्रीमान

    अपने के कविता (मोन पौडेत ऐच्छ कलम गाछी) कलम गाछी के याद कs ताज़ा करैत ह्रदय कय छुई गेल उम्मीद करेत छलो अपने के कलम स और कविता पढाई लय मिलत अति सुन्दर अहिना लिखैत रहू !

    ReplyDelete
  2. बहुत निक कविता अछि अजय जी अहिना मैथिली आर मिथिला के प्रति लिखैत रहू !अपने के कविता काविले तारीफ अछि !!

    ReplyDelete
  3. ahan dunu gote ke bahut bahut dhanyavaad. ham koshish mein chhee je jaldiye aar kich ahan sab ke lel prastut karab.

    ReplyDelete
  4. भैया प्रणाम

    अपने'क सरल शब्द सं सुसोभित कविता (मोन पौडेत ऐच्छ कलम गाछी) सच - मूच मए हमर ह्रदय कस भेद देलक, अपने'क कविता पढैत-पढैत हम बीतल समय के स्मरण में लिन भो गेलो ! ओहो एक समय छले जै समय मए हम सब कलम गाछी ओग्रैत रही ओ गाछी के बास सं बनल पेंगा झुला आहा जा तक जिब मोन रहत, अपन गाछी के सोन्हा-बेलवा, मालदा -कलकतिया,
    सिन्दुरिया आ कृष्न्भोग आम सब के तय बाते किछ और छले आब नै ओ गाछी अछि नै ओ सोन्हा-बेलवा, मालदा -कलकतिया,सिन्दुरिया आ कृष्न्भोग आम, बस इये समझू अपने के कविता पढी क मन तृप्त भेल !!

    http://maithilaurmithila.blogspot.com/


    उम्मीद अछि अपने'क अगला कविता जल्दिये पढ़ई लय मिलत !!

    ReplyDelete
  5. ajay ji Ahan ke likhal kabita gaama ghar ke yad bhoot nik dilabaiya , hamr Apan Aai apan gramin jiwan ke bital kahani yada Aabait Achhi
    Aasha Achhi bahoot our kichhu yad dilabai ke lela ,

    bahoot- bahoo dhany wad Achhi
    gam ghar ke yad dilaabai ke lela

    jay maithil , jay mithla

    ReplyDelete
  6. आत्मासँ हृदयसँ लिखल एहि ब्लॉगक सभ पद्य हृदयकेँ छुबैत अछि।

    গজেন্দ্র ঠাকুব

    ReplyDelete
  7. सोन्हा-बेलवा, मालदा -कलकतिया,
    सिन्दुरिया आ कृष्न्भोग,
    कीछ सुखायल , किछ मुर्झायल,
    सब गाछ में लागल रोग॥

    हमरा मोन ऐच्छ नीक जकाँ,
    आम गाछ मजरल जहाँ,
    पटिया गेरुआ ल सब भागल गाछी ,
    गाम पर रुकल कियो कहाँ ॥

    फेर त कियो टिकुला बीछैत,
    कियो जोगाड़ में गोपी के,
    आन्हर बीहैएर में कियो गमछा भैरेय,
    कियऊ मोटरी बनाबे धोती के॥

    खट्टा चटनी कुच्चा अचार,
    त कियो बेहाल ऐच्छ अम्मत्त में,
    आब त गाछी सुनसान पडल ऐच्छ,
    जेना ठाढ़ छी मरघट में...
    ati sundar

    ReplyDelete
  8. ee blog samanya aa gambhir dunu tarahak pathakak lel achhi, maithilik bahut paigh seva ahan lokani kay rahal chhi, takar jatek charchaa hoy se kam achhi.

    dr palan jha

    ReplyDelete
  9. Anonymous8:17 PM

    wah ki likhlath.
    Bahut bahut dhanyabad.

    Ratish

    ReplyDelete

"विदेह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका http://www.videha.co.in/:-
सम्पादक/ लेखककेँ अपन रचनात्मक सुझाव आ टीका-टिप्पणीसँ अवगत कराऊ, जेना:-
1. रचना/ प्रस्तुतिमे की तथ्यगत कमी अछि:- (स्पष्ट करैत लिखू)|
2. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो सम्पादकीय परिमार्जन आवश्यक अछि: (सङ्केत दिअ)|
3. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो भाषागत, तकनीकी वा टंकन सम्बन्धी अस्पष्टता अछि: (निर्दिष्ट करू कतए-कतए आ कोन पाँतीमे वा कोन ठाम)|
4. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो आर त्रुटि भेटल ।
5. रचना/ प्रस्तुतिपर अहाँक कोनो आर सुझाव ।
6. रचना/ प्रस्तुतिक उज्जवल पक्ष/ विशेषता|
7. रचना प्रस्तुतिक शास्त्रीय समीक्षा।

अपन टीका-टिप्पणीमे रचना आ रचनाकार/ प्रस्तुतकर्ताक नाम अवश्य लिखी, से आग्रह, जाहिसँ हुनका लोकनिकेँ त्वरित संदेश प्रेषण कएल जा सकय। अहाँ अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर सेहो पठा सकैत छी।

"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि।
अपन टीका-टिप्पणी एतए पोस्ट करू वा अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ।

'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...