Wednesday, June 04, 2008

भालसरिक गाछhttp://www.videha.co.in/

1.
भजन विनय
प्रभू बिनू कोन करत दुखः त्राणः॥ कतेक दुःखीके तारल जगमे भव सागर बिनू जल जान, कतेक चूकि हमरासे भ’ गेल सोर ने सिनई छी कानः॥ अहाँ के त बैनि परल अछि पतित उधारन नाम ।नामक टेक राखू प्रभू अबहूँ हम छी अधम महानः॥ जौँ नञ कृपा करब एहि जन पर कोना खबरि लेत आन। रामजी पतितके नाहिँ सहारा दोसर के अछि आनः॥
2. भजन लक्ष्मी नारायण जीक विनय
लक्ष्मी नारायण अहाँ हमरा ओर नञ तकइ छी यौ। दीनदयाल नाम अहाँके सभ कहए अछि यौ। हमर दुःख देखि बिकट अहाँ डरए छी यौ। ब्याध गणिका गिध अजामिल गजके उबारल यौ। कौल किरात भिलनी अधमकेँ उबारल यौ। कतेक पतितके तारल अहाँ मानि के सकत यौ। रुद्रपुरके भोलानाथ अहाँ के धाम गेलायो। ज्यों न हमरा पर कृपा करब हम कि करब यौ। रामजी अनाथ एक दास राखु यौ। 3. भजन विनय भगवती
जय जय जनक नन्दिनी अम्बे, त्रिभुवन के तू ही अवलम्बेः। तुमही पालन कारनी जगतके, शेष गणेश सुरन केः। तेरो महिमा कहि न सकत कोउ, सकुचत सारभ सुरपति कोः। मैँ हूँ परमदुखी एहि जगमे, के नञ जनए अछि त्रिभुवनमेः॥ केवल आशा अहाँक चरणके, राखू दास अधम केः॥ कियो नहि राखि सकल शरणोंमे, देख दुखी दिनन केः॥ जौँ नहि कृपा करब जगजननी, बास जान निज मनमे। तौँ मेरो दुख कौन हटावत, दोसर छाड़ि अहाँकेः॥ कबहौँ अवसर पाबि विपति मेरो कहियो अवधपति को, रामजी को नहि आन सहारा छाड़ि चरण अहाँकेः॥
4. भजन विनय
प्रभु बिनु कौन करत दुःख त्राणः।। कतेक दुखीके तारल जगमे भवसागर बिनु जल जानः॥ कतेक चूकि हमरासे भ’ गेल, स्वर नञ सुनए छी कानः।। अहाँके तौँ बानि पड़ल अछि,पतित उधारण नामः।
नामक टेक राखु अब प्रभुजी हम छी अधम जोना।
कृपा करब एहि जन पर कोन खबरि लेत आन। रामजी पतितके नाहि सहारा दोसर के अछि आनः॥

5. विहाग

भोला हेरू पलक एक बेरः॥ कतेक दुखीके तारल जगमे कतए गेलहुँ मेरो बेरः॥ भूतनाथ गौरीवरशंकर विपत्ति हरू एहि बेरः॥ जोना कृपा करब शिवशंकर कष्ट मिटत के औरः॥ बड़े दयालु जानि हम एलहुँ अहाँक शरण सुनि सोरः॥ रामजीके नहि आन सहारा दोसर केयो नहि औरः॥
6. भजन महेशवाणी
भोला कखन करब दुःख त्रान? त्रिविध ताप मोहि आय सतावे लेन चहन मेरो प्राण॥ निशिवासर मोहि युअ समवीने पलभर नहि विश्रामः॥ बहुत उपाय करिके हम हारल दिन-दिन दुःख बलबान, ज्यौँ नहि कृपा करब शिवशंकर कष्ट के मेटत आन॥ रामजीके सरण राखू प्रभु, अधम शिरोमणि जान॥भोला.॥
7.
विनय विहाग
राम बिनु कौन हरत दुःख आन कौशलपति कृपालु कोमल चित जाहि धरत मुनि ध्यान॥ पतित अनेक तारल एहि जगमे, जग-गणिका परधान।। केवट,गृद्ध अजामिल तारो, धोखहुषे लियो नाम, नहि दयालु तुअ सम काउ दोसर, कियो एक धनवान।। रामजी अशरण आय पुकारो, भव ले करू मेरो त्राण॥रामबिनु॥

8. भजन विनय
लक्ष्मीनारायण हमर दुःख क्खन हरब औ॥ पतित उधारण नाम अहाँके सभ कए अछि औ, हमरा बेर परम कठोर कियाक होइ छी औ।। त्रिविध ताप सतत निशि दिन तनबै अछि औ॥ अहाँ बिना दोसर के त्राण करत औ॥ देव दनुज मनुज हम कतेक सेवल औ, कियो ने सहाय भेला विपति काल औ॥ कतेक कहब अहाँके जौँ ने कृपा कर औ, रामजीके चाड़ि अहाँक के शरण राखन औ॥
9. भजन विनय एक बेर ताकू औ भगवान, अहाँक बिना दोसर दुःख केहरनाअन॥ निशि दिन कखनौ कल न पड़ै अछि,
कियो ने तकैये आन केवल आशा अहाँक चरणके आय करू मेरे त्राण॥ कतेक अधमके तारल अहाँ गनि ने सकत कियो आन, हमर वान किछु नाहि सुनए छी, बहिर भेल कते कान॥ प्रबल प्रताप अहाँक अछि जगमे
के नहि जनए अछि आन, गणिका गिद्ध अजामिल गजके जलसे बचावल प्राण॥ जौँ नहि कृपा करब रघुनन्दन, विपति परल निदान, रामजीके अब नाहि सहारा, दोसर के नहि आन॥
10. महेशवानी
सुनू सुनू औ दयाल, अहाँ सन दोसर के छथि कृपाल॥ जे अहाँ के शरण अबए अछि सबके कयल निहाल, हमर दुःख कखन हरब अहाँ, कहूने झारी लाल॥ जटा बीच गंगा छथि शोभित चन्द्र विराजथि भाल, झारीमे निवास करए छी दुखियो पर अति खयाल॥ रामजीके शरणमे राखू, सुनू सुनू औ महाकाल, विपति हराऊ हमरो शिवजी करू आय प्रतिपाल॥

11. महेशवानी

काटू दुःख जंजाल,
कृपा करू चण्डेश्वर दानी काअटू दुःख जंजाल॥ जौँ नहि दया करब शिवशंकर, ककरा कहब हम आन, दिन-दिन विकल कतेक दुःख काटब
जौँ ने करब अहाँ खयाल॥ जटा बीच गंगा छथि होभित, चन्द्र उदय अछि भाल, मृगछाला डामरु बजबैछी, भाँग पीबि तिनकाल॥ लय त्रिशूलकाटू दुःख काटू, दुःख हमरो वेगि करू निहाल, रामजी के आशा केवल अहाँके, विपति हरू करि खयाल॥

12. महेशवानी
शिव करू ने प्रतिपाल, अहाँ सन के अछि दोसर दयाल॥ भस्म अंग शीश गंग तीलक चन्द्र भाल, भाँग पीब खुशी रही , रही दुखिया पर खयाल। बसहा पर घुमल फिरी, भूत गण साथ, डमरू बजाबी तीन
नयन अछि विशाल॥ झाड़ीमे निवास करी, लुटबथि हीरा लाल, रामजी के बेर शिव भेलाह कंगाल॥
13.
महेशवानी
शिवजी केहेन कैलौँ दीन हमर केहेन॥ निशिदिन चैन नहि
चिन्ता रहे भिन्न, ताहू पर त्रिविध ताप कर चाहे खिन्न॥ पुत्र दारा कहल किछु ने सुनै अछि काअ ताहू पर परिजन लै अछि हमर प्राण॥ अति दयाल जानि अहाँक शरण अयलहुँ कानि, रामजी के दुःख हरू अशरण जन जानि॥

14.
महेशवानी
विधि बड़ दुःख देल, गौरी दाइ के एहेन वर कियाक लिखि देल॥ जिनका जाति नहि कुल नहि परिजन, गिरिपर बसथि अकेल, डमरू बजाबथि नाचथि अपन कि भूत प्रेत से खेल॥ भस्म अंग शिर शोभित गंगा,
चन्द्र उदय छनि भाल
वस्त्र एकोटा नहि छनि तन पर
ऊपरमे छनि बघछाल,
विषधर कतेक अंगमे लटकल, कंठ शोभे मुंडमाल, रामजी कियाक झखैछी मैना गौरी सुख करती निहाल॥

15.
विहाग
वृन्दावन देखि लिअ चहुओर॥
काली दह वंशीवट देखू, कुंज गली सभ ठौर, सेवा कुंजमे ठाकुर दर्शन, नाचि लिअ एक बेर॥ जमुना तटमे घाट मनोहर, पथिक रहे कत ठौर, कदम गाछके झुकल देखू, चीर धरे बहु ठौर॥ रामजी वैकुण्ठ वृन्दावन घूमि देखु सभ ठौर, रासमण्ड ल’ के शोभा देखू, रहू दिवस किछु और।। 16. विहाग
मथुरा देखि लिअ सन ठौर॥ पत्थल के जे घाट बनल अछि, बहुत दूर तक शोर, जमुना जीके तीरमे, सन्न रहथि कते ठौर॥ अस्ट धातुके खम्भा देखू, बिजली बरे सभ ठौर, सहर बीच्मे सुन्दर देखू, बालु भेटत बहु ढ़ेर॥ दुनू बगलमे नाला शोभे, पत्थल के है जोर कंशराजके कीला देखू देवकी वो वसुदेव॥ चाणूर मुष्टिक योद्धा देखू कुबजा के घर और, राधा कृष्णके मन्दिर देखू, दाउ मन्दिर शोर॥ छोड़ विभाग
रामजी मधुबन, घूमि लिअ अब, कृष्ण बसथि जेहि ठौर॥ गोकुल नन्द यशोदा देखू कृष्ण झुलाउ एक बेर॥
17. महेशवानी
भोला केहेन भेलौँ कठोर, एक बेर ताकू हमरहुँ ओर॥ भस्म अंग शिर गंग विराजे, चन्द्रभाल छवि जोर।।
वाहन बसहा रुद्रमाल गर, भूत-प्रेतसँ खेल॥ त्रिभुवन पति गौरी-पति मेरो जौँ ने हेरब एक बेर, तौँ मेरो दुःख कओन हरखत सहि न सकत जीव मोर॥ बड़े दयालु जानि हम अयलहुँ, अहाँक शरण सूनि शोर, राम-जी अश्रण आय पुकारो, दिजए दरस एक बेर॥
18. भजन विनय
सुनू-सुनू औ भगवान, अहाँक बिना जाइ अछि
आब अधम मोरा प्राण॥
कतेक शुरके मनाबल निशिदिन कियो न सुनलनि कान, अति दयालु सूनि अहाँक शरण अयलहुँ जानि॥ बन्धु वर्ग कुटुम्ब सभ छथि बहुत धनवान, हमर दुःख देखि-देखि हुनकौ होइ छनि हानि।। रामजी निरास एक अहाँक आशा जानि, कृपा करी हेरु नाथ, अशरण जन जानि॥
19. महेशवाणी
देखु देखु ऐ मैना, गौरी दाइक वर आयल छथि, परिछब हम कोना। अंगमे भसम छनि,भाल चन्द्रमा
विषधर सभ अंगमे, हम निकट जायब कोना॥ बाघ छाल ऊपर शोभनि,मुण्डमाल गहना, भूत प्रेत संग अयलनि,बरियाती कोना॥ कर त्रिशूल डामरु बघछाला नीन नयना हाथी घोड़ा छड़ि पालकी वाहन बरद बौना॥ कहथि रामजी सुनु ऐ मनाइन, इहो छथि परम प्रवीणा, तीन लोकके मालिक थीका, करु जमाय अपना॥

20.
महेशवानी
एहेन वर करब हम गौरी दाइके कोना॥ सगर देह साँप छनि, बाघ छाल ओढ़ना, भस्म छनि देहमे,विकट लगनि कोना॥
जटामे गंगाजी हुहुआइ छथि जेना, कण्ठमे मुण्डमाल शोभए छनि कोना॥ माथे पर चन्द्रमा विराजथि तिलक जेकाँ, हाथि घोड़ा छाड़ि पालकी,बड़द चढ़ल बौना॥ भनथि रामजी सुनु ऐ मैना, गौरी दाइ बड़े भागे, पौलनि कैलाशपति ऐना॥

21.
भजन विहाग
राम बिनु विपति हरे को मोर॥ अति दयालु कोशल पै प्रभुजी, जानत सभ निचोर, मो सम अधम कुटिल कायर खल, भेटत नहि क्यो ओर॥ ता’ नञ शरण आइ हरिके हेरू प्लक एक बेर, गणिका गिद्ध अजामिल तारो पतित अनेको ढेर॥ दुःख सागरमे हम पड़ल छी, जौँ न करब प्रभु खोज, नौँ मेरो दुःख कौन हारावन, छड़ि अहाँ के और॥ विपति निदान पड़ल अछि निशि दिन नाहि सहायक और, रामजी अशरण शरण राखु प्रभु, कृपा दृष्टि अब हेरि॥ 22. भजन विहाग
विपति मोरा काटू औ भगवान॥
एक एक रिपु से भासित जन, तुम राखो रघुवीर, हमरो अनेक शत्रु लतबै अछि, आय करू मेरो त्राण॥ जल बिच जाय गजेन्द्र बचायो, गरुड़ छड़ि मैदान, दौपति चीर बढ़ाय सभामे, ढेर कयल असमान॥ केवट वानर मित्र बनाओल, गिद्ध देल निज धाम, विभीषणके शरणमे राखल राज कल्प भरि दान॥ आरो अधम अनेक अहाँ तारल सवरी ब्याध निधान, रामजी शरण आयल छथि, दुखी परम निदान॥

23.
महेशवानी
हम त’ झाड़ीखण्डी झाड़ीखण्डी हरदम कहबनि औ॥ कर-त्रिशूल शिर गंग विराजे, भसम अंग सोहाई, डामरु-धारी डामरुधारी हरदम कहबनि औ॥ चन्द्रभाल धारी हम कहबनि, विषधरधारी विषधरधारी हरदम कहबनि औ॥ बड़े दयालु दिगम्बर कहबनि,गौरी-शंकर कहबनि औ, रामजीकेँ विपत्ति हटाउ, अशरणधारी कहबनि औ॥
24.

चैत नारदी जनानी
बितल चैत ऋतुराज चित भेल चञ्चल हो, मदल कपल निदान सुमन सर मारल हो॥ फूलल बेलि गुलाब रसाल कत मोजरल हो, भंमर गुंज चहुओर चैन कोना पायब हो॥ युग सम बीतल रैन भवन नहि भावे ओ, सुनि-सुनि कलरव सोर नोर कत झहरत हो॥ रामजी तेजब अब प्राण अवधि कत बीतल हो, मधुपुर गेल भगवान, पलटि नहि आयल हो॥
25. भजन लक्ष्मीनारायण
लक्ष्मीनारायण हमरा ओर नहि तकय छी ओः॥ दीन दयाल नाम अहाँक सब कहैये यौ हमर दुखः देखि विकट अहूँ हरै छी योः॥ ब्याध गणिका गृध अजामिल गजके उबाड़ल यो कोल किरात भीलनि अधमके ऊबारल यो कतेक पैतके तारल अहाँ गनि के सकत यो रुद्रपुरके भोल्मनाथ अहाँ धाम गेलायोः॥ जौँ नञ हमरा पर कृपा करब हम की करब यौ रामजी अनाथ एक दास राखू योः॥
26. महेशवानी
शिव हे हेरु पलक एक बेर हम छी पड़ल दुखसागरमे
खेबि उतारु एहि बेर॥ जौँ नञ कृपा करब शिवशंकर हम ने जियब यहि और॥ तिविध ताप मोहि आय सतायो
लेन चह्त जीव मोर॥ रामजीकेँ नहि और सहारा, अशरण शरणमे तोर॥

27.
समदाउन
गौनाके दिन हमर लगचाएल सखि हे मिलि लिअ सकल समाजः॥ बहुरिनि हम फेर आयब एहि जग दूरदेश सासुरके राजः॥ निसे दिन भूलि रहलौँ सखिके संग नहि कएल अपन किछु काजः। अवचित चित्त चंचल भेल बुझि
मोरा कोना करब हम काजः। कहि संग जाए संदेश संबल किछु दूर देश अछि बाटः॥ ऋण पैंच एको नहि भेटत
मारञमे कुश काँटः॥ हमरा पर अब कृपा करब सभ क्षमब शेष अपराध रामजी की पछताए करब अब
हम दूर देश कोना जाएबः॥

28.
महेशवाणी
कतेक कठिन तप कएलहुँ गौरी
एहि वर ले कोना॥
साँप सभ अंगमे सह सह करनि कोना, बाघ छाल ऊपरमे देखल, मुण्डमाल गहना॥ संगमे जे बाघ छनि,बरद चढ़ना,
भूत प्रेत संगमे नाचए छनि कोना॥ गंगाजी जटामे हुहुआइ छथि कोना, चन्द्रमा कपार पर शोभए छथि कोना। भनथि रामजी सुनुए मैना, शुभ शुभ के गौरी विवाह हठ छोड़ू अपना॥

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

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