Monday, February 11, 2008

केहेंन हुए आहा के जीवन साथी.....


मिथिला बहिन लोकेन के लेल खाश"

एक लड़की के लेल हुनकर विवाह बेहद महत्वपूर्ण क्षण होइत छैन ! अपन माँ - बाबूजी के साथ जीवन बिताबैं के पश्चात जखन ओ दोसर के जीवन संगिनी बैन क हुनकर घर जैत छैथ त निश्चित रूप स हुनका स किछ अपेक्षा रखैत छैथ ! जेय पर खरा उतरे के लेल हुनका एक आदर्श 'जीवन - संगनी ' के दायित्व निभाबे परेत छैन ! हुनकरे भूमिका पर घर के समृधि आर सुख - शान्ति काफी हद तक निर्भर करैत छैन ! कहल गेल अछि की सफल व्यक्ति के सफलता के पीछा स्त्री के हाथ होइत छैन ! अतः आहा एक आदर्श 'जीवन - संगिनी' भो साकेत छ्लो यदि आहा हर कदम पर अपन हम सफर के साथ दियेन आर परिवार म यदि सामंजस्य बनेना राखी ! आबू देखि कोना बनल जैय एक आदर्श 'जीवन - संगिनी'

* आर्थिक आधार पर अपन पति के ओरो स तुलना करब आहाके जीवन म जहर घोइल सके य ! अतः कखनो पाई क सुख आर समृधि के आधार नें समझे के गलती करू ! पाई स सोना के महल खरीद सके छी मुदा निंद नें ! बेहतर हेत यदि आहा अपन पति के जिम्मेदारी आर मज़बूरी क समझे के प्रयाश करी ! हुनकर काम म हाथ बटाबियोंन, अगर आहा पढ़ल - लिखल छी त आर्थिक सहयोग दे क हुनकर तनाव कम करे के प्रयाश करी ! आहक भावनात्मक नैतिक आर आर्थिक सहयोग हुनका आश्वस्त करतेंन की हुनकर जीवन-संगिनी दुःख - सुख म हुनकर साथ दें छैन ! बहिन सब स पैघ सहयोग होई छै भावनात्मक संबल जे एक पति क हुनकर जुझारू ऐवं सुलझल पत्नी के सिवा कियो नै दे सकेत छथिन ! माँ, बहिन के रिश्ता अपन जगह अत्यन्त महत्वपूर्ण होई छै ! खाली अहि के उपस्थिति हुनकर रिश्ता के पूर्ति नै करे छैन ! आहा क इ नै भुल्बाक चाही की हुन्करो अपन माँ - बाबूजी, भाई - बहिन छैन ! जिन्करो देखभाल हुनके केनेय छैन ! एहेंन स्थिति नै आबे दीयोंन की हुनकर परिवारक सदय्श अपना आप क उपेक्षित महसूस करैत !

* वर्तमान युग म संयुक्त परिवार के विघटन होई के एक बहुत बड़ा कारन इ छलें की विवाह के उपरांत अलग गृहस्थी बनाबे के बिचार मस्तिष्क पर हावी भेल जे रहल अछि ! भौतिक प्रतिस्पर्धा, आधुनिक चकाचौध आर अधिक स अधिक वस्तु के संग्रह के क आरामदायी जीवन व्यतीत करे के चाह हमरा सब क रहे या आई पाछा हम सब अपन सब सम्बन्ध क भूले दैत छलो ! हमरा सब क इ सोच्बाक चाही की विवाह के उपरांत अपन सास - ससुर के प्रति उपेक्षा के भावे आई वृधाश्रम के संख्या बढे रहल अछि ! ताहि लेल निक हेत की आहा अपन सब आवश्यकता म संतुलन बनेना राखी ! परिवार क बिखरे स बचाबी !


* अपन पति के योग्यता आर हुनकर क्षमता के तुलना दोसर स नै करबाक चाही ! किये की हुनकर तुलना दोसर स केने स हुनकर स्वाभिमान क ठेस पहुचतैन ! एक बात क सदैव गाठ बैंध क चलुकी आहा के पति चाहे जेहेंन हुवे , हुनका ओही रूप म स्वीकारी ! आपसी सामंजस्य, बुद्धिमत्ता आर सूझबूझ स गृहस्थी के गाड़ी क आगा बढाबी ! हुनकर मेहनत के प्रशंसा कारियोंन आर कन्धा स कन्धा मिले क गृहस्थी के सुख एश्वर्य बनाबे म हुनकर साथ दीयोंन ! याद रहे जिम्मेदारी म साझापन आर विचार म सामंजस्य बनेना राखब पति - पत्नी दुनु के जिमेदारी छी ! आहा यदि इ गुण अपनाबी त कैल अपन मिथिला समाज के दोसरो बहिन आहा स प्रेरित हेती ! उम्मीद करेत छलो हमर ब्लोग आहा सब पसंद करब !


हम जीतमोहन जी के तहे दिल स आभारी छियेंन जे ओ इ मैथिली" ब्लोग बनेलेथ आर ओई पर हमरा किछ लिखे के आग्रह केलेथ !

6 comments:

  1. mamtaa jee,
    saadar abhivaadan . sabsa pahine ta ahaan ke aihe blog jagar par bahut bahut swagar aichh. kamal ke gapp aichh je ahan apan pahile post mein ehen gambheer vishay uttha daloun hain je kam sa kam mithilaanchal ke kuno beti ta nahin soch sakait achh. chalu ummed karait chhe je aagoo aar bahut kich padhay lel bhetat. yadi ham kich sahyog ka sakee ta ahobhaagya.

    ajay kumar jha
    9871205767

    ReplyDelete
  2. अजय जी अपने के बहुत बहुत धन्यवाद जे अपने हमर ब्लोग पसंद केलो जहा तक सहयोग के बात अछि त भे सका त एक आध ब्लोग आहू आई मैथिल और मिथिली ब्लोग पर प्रस्तुत करे के प्रयाश करब !!

    ReplyDelete
  3. baDDa nik blog achhi ee

    ReplyDelete
  4. its realy nice. i dont know mathaily but i belong frm dat state

    ReplyDelete
  5. ee blog samanya aa gambhir dunu tarahak pathakak lel achhi, maithilik bahut paigh seva ahan lokani kay rahal chhi, takar jatek charchaa hoy se kam achhi.

    dr palan jha

    ReplyDelete
  6. shankar11:43 AM

    bahut nik

    ReplyDelete

"विदेह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका http://www.videha.co.in/:-
सम्पादक/ लेखककेँ अपन रचनात्मक सुझाव आ टीका-टिप्पणीसँ अवगत कराऊ, जेना:-
1. रचना/ प्रस्तुतिमे की तथ्यगत कमी अछि:- (स्पष्ट करैत लिखू)|
2. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो सम्पादकीय परिमार्जन आवश्यक अछि: (सङ्केत दिअ)|
3. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो भाषागत, तकनीकी वा टंकन सम्बन्धी अस्पष्टता अछि: (निर्दिष्ट करू कतए-कतए आ कोन पाँतीमे वा कोन ठाम)|
4. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो आर त्रुटि भेटल ।
5. रचना/ प्रस्तुतिपर अहाँक कोनो आर सुझाव ।
6. रचना/ प्रस्तुतिक उज्जवल पक्ष/ विशेषता|
7. रचना प्रस्तुतिक शास्त्रीय समीक्षा।

अपन टीका-टिप्पणीमे रचना आ रचनाकार/ प्रस्तुतकर्ताक नाम अवश्य लिखी, से आग्रह, जाहिसँ हुनका लोकनिकेँ त्वरित संदेश प्रेषण कएल जा सकय। अहाँ अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर सेहो पठा सकैत छी।

"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि।
अपन टीका-टिप्पणी एतए पोस्ट करू वा अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ।

'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...